मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

आपकी छाँव में (प्रेमगीत/कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

■ आपकी छाँव में 

(कविता)

हम आपकी छाँव में जब भी बैठे रहे
धूप आती रही और हम मचलते रहे।

आपकी एक झलक के कायल हुए
जो नजरें मिली तो हम घायल हुए
यह खेल तकदीर का हम खेल रहे
इस इबादत में हर बार फिसलते रहे।

हम आपके थे और आप हमारे हुए
जो अपने थे कभी वो भी पराए हुए
क्या ऐसा था आपमें और हम ही में
जो हम दोनों मोम - से पिघलते रहे।

कभी पागल तो कभी मतवाले हुए
आप चाह में न चाहे जो किनारे हुए
खोजना न कंकर उन दर - किनारे
हम आँखों के मंजर यहीँ बिखरते रहे।

अब बहुत देर हुई हमें यहाँ आए हुए
चलो वापस वहीं जहाँ से लाए हुए
खो जाओगे तुम अपनी जिंदगी में
रहेंगे हम तुम्हारे जो प्राण निकलते रहे।

पता नहीं कि फिर से मुलाकातें होगी
जाओगे अब तो रातें फिर लंबी होंगी
तुम बिन अकेले कैसे कटेगा कारवाँ
जो यादों के जुगनू 'मंजीते' टिमकते रहे।
-०-
22 जनवरी 2022
रचनाकार:  मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' ©® 
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका,  सातारा (महाराष्ट्र)

संपर्क पता
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'  
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका
भिरडाचीवाडी, डाक- भुईंज,  
तहसील- वाई, जिला- सातारा महाराष्ट्र
पिन- 415 515
मोबाइल: 9730491952
ईमेल: machhindra.3585@gmail.com
-0-

पितृ बरगद (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'


 ■ पितृ बरगद 

(कविता)

कल जो हम थे
वहीं आज भी हैं
बदला है तो बस 
समा औ समय।
हम तो वहीं हैं
उस बरगद के पेड़ से
फैलाते हुए टहनियाँ
और जड़ों की ओर 
बढ़ाते रेशमियाँ
जो नींव में ढलकर
नव बरगद हो जाएगी
नव शिशु बड़ कहेगी।
झूम उठेगा बरगद
देता जीवन को अर्थ
बढ़ा और बढ़ाता रहा
न किया जीवन व्यर्थ।
आँधियाँ थीं बहारें
बरस रही थीं अंगारे
पर थके कभी न हारे
बस चलता चला
सभी को बाँधे-
एक तान में
एक जान में
एक आन में
अभिमान में
कि रहेगा समा 
और मेरी जड़ें,
वहीं मुझे लिए
अपनी गोद में खड़े!
आश्वस्त होऊँगा
कि अब चलने को है
रहें न रहें हम यहाँ
फूल-सा महकने को है!
(एक बाप की अभिलाषा)
-०-



19 जनवरी 2022
रचनाकार:  मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' ©® 
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका,  सातारा (महाराष्ट्र)

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भिरडाचीवाडी, डाक- भुईंज,  
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हिंदी हिंदोस्ताँ की जान (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

 

■ हिंदी हिंदोस्ताँ की जान 

(कविता)

सुनो विश्व के हिंद-स्नेहियों
हिंदी हमारी पहचान रे,
मधुर मधु-सी अपनी हिंदी
हिंदोस्ताँ की जान रे!

संस्कार भारती के इसपर
भारतीयता के निशान है,
जो भी आया इसके आँगन
करता रहा अभिमान है,
हिंदी सबको मित बनाती
गाओ मिलकर गुणगान रे!

भाषा कोई वाद न करती
करती रहती सुसंवाद है,
क्यों लड़ते हो भाषावाद पर
हिंदी विश्व क्रांतिवाद है,
आओ हाथ मिला लें अपने
करें मातृभाषा के सम्मान रे!

जलबिन मछली जो है तड़पें
राष्ट्रभाषा बिन हिंदुस्तान रे,
क्या हमारा धर्म नहीं कि
फुंके राष्ट्रभाषा के प्राण रे,
हिंदी न कोई प्रांतिय बोली
जोड़ती है इन्सान रे!
-०-
10 जनवरी 2022
रचनाकार:  मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' ©® 
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका,  सातारा (महाराष्ट्र)

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■ कोंकण की सैर■ (बाल कहानी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

कोंकण की सैर (कहानी रविवार की सुबह थी। आसमान में हल्के बादल छाए हुए थे। घर के आँगन में आम के पेड़ के नीचे दादा जी आराम से बैठे अखबार पढ़ रहे...

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