मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

■ सच्चाई का मोल ■ (बालकहानी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

 


■ सच्चाई का मोल ■

(बालकहानी)

       आज शमिता के छात्रवृत्ति परीक्षा के परिणाम घोषित हुए। पूरे विद्यालय में उत्साह का माहौल था। जुलूस निकाला गया, मिठाइयाँ बाँटी गईं और छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले छात्रों के सचित्र बैनर लगाए गए। तीस में से चौबिस छात्र उत्तीर्ण हुए और नौ छात्रों को छात्रवृत्ति मिली। शमिता ने जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। शिक्षा अधिकारी और अन्य मान्यवर विद्यालय आए और सभी सफल छात्रों का अभिनंदन किया। यह समाचार सुनकर शमिता के माता-पिता की खुशी का ठिकाना न रहा।

      शाम को जब शमिता घर लौटी, तो उसके चेहरे पर उदासी थी। माँ ने उसे पास बुलाकर प्यार से कहा, “बधाई हो, बेटा! तूने हमारा और विद्यालय का नाम रोशन किया। लेकिन तू इतनी उदास क्यों है? कुछ चाहिए तो बता।”

      यह सुनकर शमिता रोने लगी। माँ ने उसे सीने से लगाकर पूछा, “क्या हुआ, शमिता? तू रो क्यों रही है?”

      शमिता ने सिसकते हुए कहा, “माँ, क्या सच्चाई का कोई मोल नहीं होता? क्या झूठ ही जीतता है?”

      माँ यह सुनकर चौंक गई। उसने पूछा, “ऐसा क्यों कह रही है?”

      शमिता बोली, “मेरी कक्षा की रीना सबसे होशियार है, लेकिन उसे छात्रवृत्ति नहीं मिली। उसे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी… लेकिन…”

      माँ ने समझाते हुए कहा, “शायद उसने परीक्षा में अच्छे उत्तर नहीं लिखे होंगे। मेहनत करने वाले को ही फल मिलता है।”
      शमिता ने सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं माँ, ऐसा नहीं है। परीक्षा के दौरान एक व्यक्ति ने मुझे उत्तरों की सूची दी थी। मैंने वही देखकर सारे उत्तर लिख दिए। रीना ने यह सब देखा, लेकिन उसने उस कागज को उठाकर कूड़ेदान में फेंक दिया और मुझसे बात करना भी बंद कर दिया।”

      यह सुनकर माँ स्तब्ध रह गई। कुछ देर तक वह चुप रही, फिर गंभीर स्वर में बोली, “शमिता, तूने गलती की है। रीना भले ही छात्रवृत्ति न पा सकी हो, लेकिन वह सम्मान की अधिकारी है। अगर तूने उसी समय सच बता दिया होता, तो आज तुझे यह दुख नहीं होता।”

      माँ की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने आगे कहा, “याद रखना, बेटा—ऐसा कोई काम मत करना जिससे हम अपनी ही नज़रों में गिर जाएँ। गलत तरीके से मिली सफलता कभी सच्चा सुख नहीं देती। वह केवल बाहर से प्रतिष्ठा देती है, भीतर से नहीं।”

      शमिता ने माँ का हाथ अपने सिर पर रखते हुए कहा, “माँ, मुझे माफ़ कर दो। मैं आज से कभी गलत काम नहीं करूँगी और न ही गलत करने वालों का साथ दूँगी।”

      तभी दरवाजे पर खड़ी रीना अंदर आई। वह मुस्कुराते हुए बोली, “अरे, यहाँ क्या चल रहा है? मैं कब से बाहर खड़ी सब सुन रही थी।”

      उसके हाथ में फूलों का गुलदस्ता और एक सुनहरी कलम थी। उसने शमिता की ओर बढ़ाते हुए कहा, “बधाई हो, शमिता! यह मेरी तरफ़ से तुम्हारे लिए छोटा-सा तोहफा।” यह सुनकर शमिता फिर से रो पड़ी। रीना ने उसे संभाला।

      माँ ने रीना से कहा, “बेटी, शमिता को अपनी गलती का पछतावा है। मैं उसकी ओर से तुमसे माफ़ी माँगती हूँ। असल में छात्रवृत्ति की हकदार तो तुम हो।”

      रीना ने मुस्कुराकर कहा, “मौसी, मैं तो वह बात कब की भूल चुकी हूँ। शमिता मेरी अच्छी सहेली है, मैं उससे नाराज़ कैसे रह सकती हूँ? और हाँ, आप दोनों की सारी बातें मैंने सुन ली हैं—मुझे माफ़ कर दीजिए।” यह कहते हुए उसने कान पकड़ लिए।

      सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई। शमिता ने रीना को गले लगाते हुए कहा, “हम कभी ऐसा काम नहीं करेंगे, जिससे हम अपनी ही नज़रों में गिर जाएँ।”

      रीना ने सहमति में सिर हिलाया, “और उन लोगों से भी सावधान रहेंगे, जो खुद गिरकर दूसरों को भी गिरा देते हैं।”

      दोनों की बात सुनकर माँ के चेहरे पर संतोष की मुस्कान आ गई। घर का वातावरण फिर से खुशी से भर गया।
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29 अप्रैल 2026 रात: 09:45 बजे
रचनाकार: मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' 



रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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■ सच्चाई का मोल ■ (बालकहानी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

  ■ सच्चाई का मोल ■ (बालकहानी)        आज शमिता के छात्रवृत्ति परीक्षा के परिणाम घोषित हुए। पूरे विद्यालय में उत्साह का माहौल था। जुलूस निकाल...

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