
रविवार की सुबह
थी। आसमान में हल्के बादल छाए हुए थे। घर के आँगन में आम के पेड़ के नीचे दादा जी
आराम से बैठे अखबार पढ़ रहे थे। तभी उनके पोते राखी और पोती स्वस्तिक दौड़ते हुए
उनके पास आए।
“दादा जी!
इस बार छुट्टियों में हम कहाँ घूमने जाएँगे?” स्वस्तिक ने
उत्सुकता से पूछा।
दादा जी ने
अखबार नीचे रखा और मुस्कुराते हुए बोले, “अगर तुम दोनों तैयार हो,
तो इस बार तुम्हें महाराष्ट्र के एक बहुत सुंदर क्षेत्र की सैर
कराता हूँ।”
“कहाँ?”
राखी ने तुरंत पूछा।
“कोंकण!”
दादा जी ने कहा।
“कोंकण?
वह कहाँ है?” स्वस्तिक ने पूछा।
दादा जी बोले, “महाराष्ट्र
के पश्चिमी भाग में अरब सागर के किनारे फैला हुआ क्षेत्र कोंकण कहलाता है। इसके एक
ओर समुद्र है और दूसरी ओर सह्याद्रि की पर्वत-श्रेणियाँ। इसलिए यहाँ समुद्र,
पहाड़, नदियाँ, झरने,
हरे-भरे जंगल और सुंदर गाँव—सब एक साथ
देखने को मिलते हैं।”
राखी ने आश्चर्य
से कहा, “तो क्या वहाँ समुद्र भी है और पहाड़ भी?”
“हाँ,”
दादा जी हँसते हुए बोले, “यही तो कोंकण
की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है।”
कुछ दिनों बाद
दादा जी, स्वस्तिक और राखी कोंकण की यात्रा पर निकल पड़े। जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते
गए, रास्ते का प्राकृतिक दृश्य बदलता गया। ऊँचे-ऊँचे
पहाड़, घने पेड़, छोटी-छोटी
नदियाँ और दूर तक फैली हरियाली दिखाई देने लगी।
स्वस्तिक खिड़की
से बाहर देखते हुए बोला,
“दादा जी, यहाँ तो चारों ओर हरियाली ही
हरियाली है!”
“हाँ बेटा,”
दादा जी ने कहा, “कोंकण में वर्षा अच्छी
होती है। वर्षाऋतु में यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य और भी बढ़ जाता है। पहाड़ों से
गिरते झरने, हरे-भरे खेत और बादलों से ढकी चोटियाँ मन को
मोह लेती हैं।”
राखी ने पूछा, “क्या
यहाँ बहुत से पेड़ भी होते हैं?”
“हाँ।
यहाँ नारियल, सुपारी, आम,
काजू और कटहल के पेड़ बहुत दिखाई देते हैं। कोंकण के हापुस आम तो
बहुत प्रसिद्ध हैं।”
स्वस्तिक खुशी
से बोला, “मुझे तो आम बहुत पसंद हैं। क्या हम हापुस आम खा सकते हैं?”
दादा जी हँस
पड़े। “क्यों नहीं! कोंकण की यात्रा आम के बिना अधूरी है।”
थोड़ी देर बाद
वे समुद्र के किनारे पहुँचे। सामने दूर-दूर तक फैला नीला समुद्र दिखाई दे रहा था।
लहरें बार-बार किनारे से टकरा रही थीं।
राखी खुशी से
बोली, “वाह! समुद्र कितना बड़ा है! इसकी कोई सीमा ही दिखाई नहीं दे रही।”
दादा जी बोले, “समुद्र
कोंकण के जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ अनेक लोग मछली पकड़ने का काम करते
हैं। समुद्र के किनारे बसे गाँवों में मछुआरों का जीवन भी देखने को मिलता है।”
स्वस्तिक ने
पूछा, “दादा जी, क्या यहाँ के लोग समुद्र से डरते
नहीं हैं?”
“समुद्र
शक्तिशाली है,” दादा जी ने समझाया, “इसलिए उसके स्वभाव को समझना जरूरी है। मछुआरे मौसम और समुद्र की स्थिति
को ध्यान में रखकर अपनी नावें समुद्र में ले जाते हैं। उनका जीवन मेहनत और साहस से
भरा होता है।”
समुद्र की लहरों
को देखते-देखते बच्चे आगे बढ़े। कुछ दूरी पर उन्हें एक ऊँचा किला दिखाई दिया।
“दादा जी!
वह क्या है?” स्वस्तिक ने पूछा।
“वह किला
है। कोंकण केवल प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि
अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के लिए भी प्रसिद्ध है।”
“कौन-कौन
से किले हैं यहाँ?” राखी ने पूछा।
दादा जी ने कहा, “कोंकण
क्षेत्र में अनेक प्रसिद्ध समुद्री और पहाड़ी किले हैं। सिंधुदुर्ग, विजयदुर्ग और रायगढ़ जैसे किले महाराष्ट्र के इतिहास की महत्त्वपूर्ण
पहचान हैं।”
“सिंधुदुर्ग
किला समुद्र में है क्या?” स्वस्तिक ने उत्सुकता से पूछा।
“हाँ,”
दादा जी बोले, “सिंधुदुर्ग किला समुद्र
में एक द्वीप पर बनाया गया है। इसे छत्रपति शिवाजी महाराज ने बनवाया था। यह किला
समुद्र की ओर से होने वाले आक्रमणों से सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण था।”
राखी ने कहा, “इतने
बड़े समुद्र के बीच किला बनाना कितना कठिन रहा होगा!”
दादा जी ने कहा, “बिल्कुल।
उस समय आधुनिक मशीनें नहीं थीं। फिर भी कुशल कारीगरों और मेहनती लोगों ने मजबूत
किले बनाए। इससे हमें उस समय की स्थापत्य-कला, योजना और
मेहनत का पता चलता है।”
इसके बाद वे
रायगढ़ की ओर गए। रास्ते में दादा जी ने बच्चों को छत्रपति शिवाजी महाराज के
इतिहास के बारे में बताया।
“रायगढ़
केवल एक किला नहीं है,” दादा जी बोले, “यह मराठा इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण धरोहर है। छत्रपति शिवाजी महाराज
के राज्याभिषेक का संबंध भी रायगढ़ से है। इसलिए इसका ऐतिहासिक महत्त्व बहुत अधिक
है।”
स्वस्तिक ने
पूछा, “दादा जी, क्या कोंकण में केवल किले ही हैं?”
“नहीं
बेटा,” दादा जी बोले, “यहाँ अनेक
प्राचीन मंदिर, गुफाएँ, पुराने
भवन और अन्य ऐतिहासिक स्थल भी हैं। ये हमारी संस्कृति और इतिहास की कहानी बताते
हैं।”
यात्रा के दौरान
बच्चों ने कोंकण के गाँवों को भी देखा। छोटे-छोटे घर, नारियल
और सुपारी के पेड़, खेत और साफ-सुथरे रास्ते देखकर उन्हें
बहुत अच्छा लगा।
एक गाँव में
उन्हें स्थानीय भोजन खाने का अवसर मिला।
राखी ने पूछा, “दादाजी,
यहाँ के भोजन में नारियल का उपयोग इतना अधिक क्यों होता है?”
दादा जी बोले, “क्योंकि
कोंकण में नारियल के पेड़ बहुत होते हैं। यहाँ की भोजन-परंपरा पर स्थानीय जलवायु
और उपलब्ध फसलों का प्रभाव दिखाई देता है। चावल, नारियल,
मछली और विभिन्न स्थानीय मसाले यहाँ के भोजन का हिस्सा हैं।”
स्वस्तिक ने कहा, “यहाँ
का जीवन तो प्रकृति के बहुत करीब है।”
“बिल्कुल,”
दादा जी ने कहा। “लेकिन हमें यह भी
समझना चाहिए कि प्रकृति केवल देखने के लिए नहीं है। उसकी रक्षा करना हमारी
जिम्मेदारी है।”
राखी ने पूछा, “हम
प्रकृति की रक्षा कैसे कर सकते हैं?”
दादा जी बोले, “समुद्र
में कचरा नहीं फेंकना चाहिए, प्लास्टिक का कम उपयोग करना
चाहिए, पेड़-पौधों को बचाना चाहिए और ऐतिहासिक स्थलों की
दीवारों पर कुछ लिखना या उन्हें नुकसान पहुँचाना नहीं चाहिए।”
स्वस्तिक ने कहा, “यानी
कोंकण हमें सुंदरता के साथ जिम्मेदारी का पाठ भी सिखाता है।”
दादा जी ने
मुस्कुराते हुए कहा,
“बिल्कुल! कोंकण केवल समुद्र और पहाड़ों का नाम नहीं है। यह
प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और
मेहनती लोगों की भूमि है।”
शाम होने लगी
थी। समुद्र के किनारे सूर्य धीरे-धीरे नीचे जा रहा था। आकाश में लाल, नारंगी
और सुनहरे रंग बिखर गए थे। समुद्र की लहरों पर सूर्य की किरणें चमक रही थीं।
राखी कुछ देर
चुपचाप उस दृश्य को देखती रही। फिर बोली, “दादा जी, कोंकण सचमुच बहुत सुंदर है। यहाँ समुद्र है, पहाड़
हैं, झरने हैं, पेड़ हैं और
पुराने किले भी।”
स्वस्तिक ने कहा, “और
यहाँ का इतिहास भी बहुत रोचक है।”
दादा जी ने
दोनों बच्चों के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “याद रखो बच्चों, किसी स्थान को जानना केवल वहाँ घूमना नहीं है। उसके प्राकृतिक वातावरण,
इतिहास, संस्कृति और लोगों को समझना भी
जरूरी है। जब हम अपनी धरती और विरासत को समझते हैं, तभी
हमें उसकी रक्षा करने का महत्त्व पता चलता है।”

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