मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

■ रावण ■ (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'



■ रावण ■
(कविता)

इस साल भी रावण का
दहन हो ही गया;
रावण मरता ही नहीं
फिर से पता चल ही गया;
अगले साल फिर रावण
को लाया जाएगा;
मरता रहेगा हर साल वो
फिर से पैदा होता जाएगा।
परंतु;
दो रावणों के बीच में 
कितनी ही कहीं कईं -
सीताएँ लूटी
लूटी माताएँ
बालिकाएँ लूटी
लूटी कोक कलिकाएँ;
और लूटा
किसीने अपनों को
किन्हीं के सपनों को
कभी आत्मविश्वास को
कभी विश्वास से श्वास को;
यह सिलसिला चलता रहा
हर कोई यहाँ लूटता रहा;
कभी महँगाई की मार से
बेरोजगारी की तलवार से
गरीबी और भूखमार से
कभी अमीरों के डकार से;
लूटी गई नौकरियाँ
छीनी गई टोकरियाँ
छीनी गई बोलियाँ
लूटी गई बालियाँ;
लूटता रहा देश
पहने सफेद भेष!
वो रावण फिर भी
असली रुप में आया था
मैं हूँ रावण, कहलाया था;
इनकी असलियत दिखाते हैं
ईडी से हमको धमकाते हैं!
अब तो लोकतंत्र ही लूट गया
पता नहीं कहाँ छूट गया;
लूटम-लूट चल रही है
रावणी टोली उठ रही है।
घर-गली से  शहर तक
गाँव से दिल्ली तक
रावण लूटाई जोरों पर है;
गिनते रहोगे कबतक
वे हजारों-करोडों पर हैं।
क्या इनका दहन 
कभी कोई कर पाएगा?
क्या मंदिर बनाने से 
वो राम और रामराज्य
फिर से आएगा?
अब.....
अपने अंदर के ही
राम को जगाना होगा
खुद बनकर राम ही
हर रावण को मिटाना होगा;
लूटम-लूट जब थम जाएगी
भारतमाता सच्चा दशहरा
तब एक बार ही मनाएगी।
नहीं तो हर साल 
रावण के पुतले जलते रहेंगे
उसकी हर चिंगारी से
हर दिन रावण पैदा होते जाएँगे
रावण मर गया, रावण मर गया
इस खुशी में खुदखुशी करते
खुशी-खुशी 
हम दीप दिवाली मनाएँगे...
■■■
21 अक्तूबर 2026 शाम 7:30 बजे
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-







■ एकता-ए-हिंदुस्थानी ■ (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

  

■ एकता-ए-हिंदुस्थानी ■

(कविता)

भारत हमारी आन है,
भारत हमारी शान है
इसकी गरिमा के लिए,
हमारी सौ जान कुर्बान है!

सभ्यता और संस्कार ही,
हमारे देश की पहचान है, ।
अलग-थलग रहते सदा,
दिल में बसता हिंदुस्थान है ।

कितने धर्म, कितनी जातियाँ,
और कितनी भाषाओं का गान है।
समता, बंधुता, एकता में बँधा,
करता सबका समान सम्मान है!

रोम-रोम कहे रहीम, रग-रग कहे राम
कोई पढ़े गीता, तो कोई पढ़े कुरान,
कश्मीर की लो या केरल की माटी,
कान लगाकर सुन लो भाई
कहती – इसमें बसता जहान है!
■■■
11 जनवरी 2023 
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-


■ मैं पथ हूँ ■ (गीत) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

 

■ मैं पथ हूँ ■

(गीत)

मैं पथ हूँ; पथिक प्यारे
किसी को मैं न रुकाता हूँ
जी-जान से जो चलने वाले
सिर उनके न झुकाता हूँ।
मैं पथ हूँ...

चलते रहो पथिक तुम
मंजिल तेरी कुछ आगे है
रुकने का तू नाम न ले
डरकर तू क्यों भागे है
डगमग पग हो चाहे जितने
कभी उन्हें न गिराता हूँ।
मैं पथ हूँ...

आशा के हिलोर भर तू
वक्त को भी पहचान ले
अंत उसका कभी न होता
खुद ही को जो पहचान ले
खुलता रहूँगा उनके खातिर
किसी को किनारे न कराता हूँ
मैं पथ हूँ....

अब तेरे हाथ है तेरी मंजिल
तू ही उसको पाएगा
करना मत बदनाम मुझको
वरना हर बार पछताएगा
तू ही तेरे जाल में फँसेगा
मैं खुद काँटे न बिछाता हूँ।
मैं पथ हूँ...
-०-
4 अक्तूबर 2026 शाम 4:30
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-


■ रावण ■ (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

■ रावण ■ (कविता) इस साल भी रावण का दहन हो ही गया; रावण मरता ही नहीं फिर से पता चल ही गया; अगले साल फिर रावण को लाया जाएगा; मरता रहेगा हर साल...

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