मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

■ चला हो जाऊया शाळेत ■ (मराठी कविता)

■ चला हो जाऊया शाळेत ■

(कविता)

चला हो जाऊया शाळेत, शाळेत,
आनंद फुलू दे गालात,
शाळेची पोरं माझ्या हातात, हातात,
नाव कमावतील देशात!

अक्षरं काढतील अंक गिरवतील
रंगही भरतील, चित्रही काढतील
उभारी देऊ त्यांच्या हातात, हातात,
नाव कमावतील देशात!

खेळांत रमतील गाणीही म्हणतील
थोडंसं हसतील थोडंसं रडतील
भात-भाजी देऊ त्यांच्या ताटात, ताटात
नाव कमावतील देशात!

ज्ञानही घेतील सर्वांना वाटतील
कष्टही करतील स्वप्नं सजवतील
स्वप्न उतरवतील सत्यात, सत्यात
नाव कमावतील देशात!

शाळा ही आमची किती सुंदर घर
मुले ही गोड प्रेम करतात फार
संस्कार घडवू त्यांच्या मनात, मनात,
नाव कमावतील मग जगतात!

-०-

06 ऑक्टोबर 2025 सकाळी: 07.58 वाजता
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-

■ हिंदी हूँ सबकी ■ (कविता)

■ हिंदी हूँ सबकी ■

(कविता)

मैं हिंदी हूँ
मैं भारत हूँ
मैं हिंदी हूँ
सबकी सारथ हूँ।

प्यार हूँ, दुलार हूँ,
संस्कार की धार हूँ
हिंदुस्तान पुकार हूँ।
बोलियों में मँझधार हूँ।

तुलसी की रामायण हूँ,
सूरदास की रसपान हूँ,
कबीरा की बानी हूँ,
मीरा की दीवानी हूँ।

गीता का ज्ञान हूँ,
भारती का संज्ञान हूँ,
कवियों की पुकार हूँ
वीरों की हुँकार हूँ,

गंगा की जलधार हूँ,
बंसी का स्वरनाद हूँ,
कुदरत की मित हूँ
देश का संगीत हूँ।

गाँवों की आवाज़ हूँ,
शहरों की संवाद हूँ,
सपनों की उड़ान हूँ,
देश का विहान हूँ।

एक फूल-सी मुस्कान हूँ
सबकी सायबान हूँ
मैं हिंदी हूँ सबकी जान हूँ
देश का मान-सम्मान हूँ
-०-

14 सितंबर 2025 सुबह: 08.00 बजे
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-


■ तो आ जा ■ (कविता)

■ तो आ जा ■
(कविता)

तू आगे मैं पीछे
मैं पीछे ही चल रहा
पीछा करते हुए;
तू आगे बढ़ती रही
मैं भी तेरे पीछे बढ़ता रहा
पर तू तो मिली न रही।
एक रोज मिलेगी
मेरे पल्ले पड़ेगी
इस ताक में पीछे चलता रहा
अपने आपको ढोता रहा;
पर तेरे पीछे चलते-चलते
मैं इतना पीछे बढ़ गया
अब मेरे पीछे कुछ नहीं
परछाई को भी रहा न गया।
अब तुम ही पलटकर
पीछे देखो.......जिंदगी 
कि तेरे पीछे भी है कोई ?
या तू भी है अकेली
ठगी किसी से दुकेली।
तो आ जा
मिलते हैं और
और मिलाते हैं - 
अकेेले-दुखेले को
पहुँचाते है सही गंतव्य;
जो सिर्फ चलते रहे
किसी के पीछे नहीं
फिर भी गिरते हैं
अकेले में ।
-०-
24 अगस्त 2025 सुबह: 12.00 बजे
रेल यात्रा के दौरान - अकेले सफर करते हुए हम सभी तो यही करते हैं । बस पीछा और पीछा, पर पता नहीं किसका, जवाब नहीं मिल पाता है।
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-


■ चला हो जाऊया शाळेत ■ (मराठी कविता)

■ चला हो जाऊया शाळेत ■ (कविता) चला हो जाऊया शाळेत, शाळेत, आनंद फुलू दे गालात, शाळेची पोरं माझ्या हातात, हातात, नाव कमावतील देशात! अक्षरं काढ...

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