मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

■ अदबी लफ़्जों ने ■ (गजल) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

■ अदबी लफ़्जों ने ■

(गजल)

अदबी लफ़्ज़ों ने किरदार बनना छोड़ दिया है।
जबसे लोगों ने असरदार बनना छोड़ दिया है।

लिखते-बोलते गए, करते गए अपनी इबादत,
औरों ने जबसे अपना बनाना छोड़ दिया है।

बहा दिया है हमने ख़ुद को पाक सलिला में,
जबसे इस दिल का आशियाना छोड़ दिया है।

कभी-कभी हवा से उतर आते हैं अंगूरी लता से,
ग़ज़ल में भरकर भरपूर पीने को छोड़ दिया है।

जो मेरे मीत बने, सदा संगी बने अकेली रातों के,
'मंजीते' जोड़ता रहा उन्हें, जो वक़्त ने छोड़ दिया है।
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16 जनवरी 2026 शाम: 09.10 बजे
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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■ पाती आदरणीय श्रीमान विशाल डोंगरे साहब (गुटशिक्षाधिकारी, सालेकसा) जी के नाम ■


■ पाती आदरणीय श्रीमान विशाल डोंगरे साहब (गुटशिक्षाधिकारी, सालेकसा) जी के नाम ■ 


दिनांक: ०५ जुलाई २०२६

आदरणीय श्रीमान विशाल एस. डोंगरे साहब
उपशिक्षाधिकारी, जिला परिषद नागपुर

सादर प्रणाम।
      आपके जिला परिषद नागपुर में उपशिक्षाधिकारी के रूप में नियुक्त होने का शुभ समाचार सुनकर हृदय अपार हर्ष, गर्व और संतोष से भर गया। इस गौरवपूर्ण उपलब्धि पर आपको हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ।

       सर, आप मिलनसार, मितभाषी, सरल, सहयोगी एवं प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत कुशल स्वभाव के धनी है। आपने सदैव पद की गरिमा को बनाए रखते हुए सभी शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के साथ आत्मीयता और सौहार्दपूर्ण व्यवहार किया। आपके इसी व्यक्तित्व ने आपको हम सभी के हृदय में एक विशेष स्थान दिलाया है।

       मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ कि शिक्षण सेवक के रूप में दो वर्षों तक आपके मार्गदर्शन में कार्य करने का अवसर मिला। इस अल्प अवधि में आपने विद्यार्थियों के हित में नए-नए उपक्रम करने, विद्यालय को निरंतर प्रगतिशील बनाने तथा स्वयं को सदैव सक्रिय रखने की जो प्रेरणा दी, वह मेरे जीवन की अमूल्य पूँजी है।

       हमारी जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर में प्रशासकीय कार्यों के सिलसिले में आपका अनेक बार आगमन हुआ। प्रत्येक भेंट में आपने विद्यालय के कार्यों की सराहना की, आवश्यक मार्गदर्शन दिया तथा विद्यार्थियों और शिक्षकों का उत्साहवर्धन किया। आपके प्रोत्साहन के शब्द आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

       केंद्र, तालुका एवं जिला स्तरीय क्रीड़ा सम्मेलनों में आपकी गरिमामयी उपस्थिति सदैव हम सभी के लिए प्रेरणादायी और उत्साहवर्धक रही। आपकी उपस्थिति मात्र से शिक्षकों और विद्यार्थियों में नया आत्मविश्वास जागृत हो जाता था।

      प्रशासकीय कार्यों में आपने सदैव सभी को साथ लेकर चलने का प्रयास किया। आपने हर शिक्षक को सम्मान दिया, परामर्श दिया और कठिन परिस्थितियों में भी सहयोग का हाथ कभी पीछे नहीं खींचा। प्रशिक्षण स्थलों पर शिक्षकों को उत्तरदायित्व का बोध कराते हुए जिस आत्मीयता से उनका मार्गदर्शन किया, वह वास्तव में अनुकरणीय है।

      व्यक्तिगत रूप से जब-जब हमारी शैक्षिक चर्चाएँ हुईं, आपने सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने, निरंतर नवाचार करने और विद्यार्थियों के हित को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा दी। आपकी यही सीख आज भी मुझे प्रतिदिन कुछ नया और बेहतर करने की ऊर्जा प्रदान करती है।

       आपसे प्रत्येक मुलाकात केवल औपचारिक नहीं होती थी। विद्यालय, विद्यार्थियों और नवीन शैक्षिक उपक्रमों पर चर्चा के साथ-साथ पारिवारिक आत्मीयता का जो स्नेह आपने दिया, वह सदैव स्मरणीय रहेगा। आपके परिवार के साथ बेवारटोला बाँध की वह सुखद सैर भी जीवन की मधुर स्मृतियों में सदैव संजोई रहेगी।

      आप सदैव रत्न पारखी रहे हैं। आपने अच्छे कार्यों की खुलकर प्रशंसा की और जहाँ सुधार की आवश्यकता रही, वहाँ उचित परामर्श देकर आगे बढ़ने का मार्ग दिखाया। कार्य में कहीं कमी दिखाई देने पर आपका कठोर रूप भी हमने देखा, किंतु वह किसी व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार प्रशासक के रूप में व्यवस्था और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए था। यही आपकी निष्पक्षता और कार्यनिष्ठा का प्रमाण है।

      हमारे द्वारा किए गए प्रत्येक छोटे-बड़े कार्य की आपने सराहना की, मार्गदर्शन दिया और आगे बढ़ने का आत्मविश्वास प्रदान किया। आपके उत्साहवर्धन ने हमें सदैव और बेहतर कार्य करने की नई ऊर्जा दी।

      सर, आपका हमारे सालेकसा क्षेत्र से जाना हम सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए निश्चित एक बड़ी क्षति है। आपके जैसा स्नेही, प्रेरणादायी एवं दूरदर्शी अधिकारी मिलना सौभाग्य की बात होती है। फिर भी हमें पूर्ण विश्वास है कि आप जहाँ भी रहेंगे, वहाँ भी अपनी कार्यकुशलता, संवेदनशीलता और नेतृत्व से शिक्षा जगत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाएँगे।

      हम सदैव आपके स्नेह, मार्गदर्शन और आशीर्वाद के आकांक्षी रहेंगे। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपके नवीन दायित्वों में आपको निरंतर सफलता प्राप्त हो, आप उत्तरोत्तर प्रगति के नए शिखरों को स्पर्श करें तथा शिक्षा क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान और अधिक सुदृढ़ करें।

       आपको एवं आपके समस्त परिवार को सफलतम भविष्य, उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुख-समृद्धि एवं निरामय जीवन की मंगलकामनाएँ। साथ ही आपकी प्यारी बिटिया को ढेर सारा स्नेह, प्यार और उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक आशीर्वाद।
       पुनः हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ।

आपका कृपाभिलाषी
मच्छिंद्र बापू भिसे
जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर
सालेकसा, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952

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■ आगे देखो ■ (लघुकथा) - मच्छिंद्र बापू भिसे ‘मंजीत


■ आगे देखो ■
(लघुकथा)

     लोकल ट्रेन में चढ़ते ही वह युवक अपने लिए बैठने की जगह ढूँढ़ने लगा। ट्रेन में जहाँ तीन व्यक्तियों के बैठने वाली सीटें थीं, वहाँ कहीं तीन तो कहीं केवल दो यात्री बैठे थे। किसी ने अपना सामान सीट पर रख छोड़ा था, तो कोई अपने पैर फैलाकर आराम से बैठा था, मानो पूरी सीट उसी की हो। सीटों के ऊपर सामान रखने की जगह भी थी; कहीं वह खाली थी तो कहीं सामान से भरी हुई। युवक ने पूरे डिब्बे पर सरसरी नज़र दौड़ाई। बीच की गैलरी में भी अनेक यात्री ऊपर लगे हैंडल पकड़कर ट्रेन के साथ हिलते-डुलते सफ़र कर रहे थे।

     कुछ देर बाद युवक एक ऐसी सीट के पास पहुँचा, जहाँ केवल दो व्यक्ति बैठे थे। उसने विनम्रता से कहा,
"भैया, बैठने के लिए थोड़ी-सी जगह बना दीजिए।"

     उनमें से एक आराम से बैठे व्यक्ति ने बिना उसकी ओर देखे कहा, "आगे देखो, बहुत जगह खाली है।"

     युवक ने फिर गैलरी में खड़े यात्रियों की ओर देखा और शांत स्वर में बोला, "भैया, आगे कहीं जगह नहीं है। आप दोनों बैठे हैं, मुझे भी अपने साथ बैठा लीजिए। यहाँ तो तीन लोग आराम से बैठ सकते हैं।"

    उस व्यक्ति ने युवक को घूरते हुए कहा, "जा, आगे देख!" युवक हल्की मुस्कान के साथ आगे बढ़ गया।

    थोड़ी दूर दूसरी सीट पर पति-पत्नी बैठे थे। दोनों के बीच सीट पर उनका सामान रखा था। युवक को लगा कि एक घंटे के सफ़र के लिए यहाँ तो जगह बन ही जाएगी। उसने विनम्रता से पूछा, "चाचा जी, यदि आप अनुमति दें तो मैं आपका सामान ऊपर रख दूँ, ताकि मुझे बैठने के लिए थोड़ी जगह मिल जाए।"

    इतना सुनते ही उस व्यक्ति की पत्नी ने अपने सामान पर ऐसे हाथ रख दिया, मानो वह वहाँ से एक इंच भी नहीं हटेगा। युवक फिर मुस्कुरा दिया। उसकी मुस्कान देखकर उस व्यक्ति ने कहा, "आगे देखो, दूसरी बर्थ पूरी खाली है।"

     युवक ने एक बार फिर गैलरी में लटके खड़े यात्रियों की ओर देखा और मन ही मन सोचा— सचमुच जगह तो बहुत खाली है... पर इन लोगों के दिल ही खाली हैं। वह बिना कुछ कहे खड़े यात्रियों के साथ हैंडल पकड़कर खड़ा हो गया।

    इसी बीच भीड़ में से एक आत्मीय आवाज़ आई— "बेटा, इधर आ जाओ... यहाँ बैठ जाओ।"

    युवक ने आवाज़ की दिशा में देखा। यह उसी सीट के पास बैठे एक बुज़ुर्ग की आवाज़ थी, जिसके बगल में पहले वाले यात्री बैठे थे। नज़रें मिलते ही बुज़ुर्ग ने फिर स्नेह से कहा, "आ जाओ बेटा, हमारी सीट पर बैठ जाओ। जगह बन जाएगी।"

      यह कहकर उन्होंने अपने नौ-दस वर्ष के पोते को गोद में बिठा लिया। सीट पर थोड़ी-सी जगह बन गई थी, लेकिन उस क्षण बुज़ुर्ग ने युवक के दिल में बहुत बड़ी जगह बना ली थी।

      युवक बैठ गया। बुज़ुर्ग मुस्कुराए और बोले, "बेटा, यह सफ़र तो कुछ मिनटों या घंटों का है। यह जगह कौन अपने साथ ले जाएगा? छोड़ो भी! आगे चलकर मैं भी मर जाऊँगा, तुम भी एक दिन बूढ़े हो जाओगे और इस दुनिया से चले जाओगे। यहाँ कोई हमेशा रहने वाला नहीं है। इसलिए आराम से बैठो।"

      बुज़ुर्ग की यह बात उस बर्थ में बैठे लगभग सभी लोगों ने सुनी। उन लोगों ने भी, जिन्होंने युवक से कहा था— 'आगे देखो।'

      अनायास युवक ने उनकी ओर देखा। वे सब नज़रें चुरा रहे थे। शायद उन्होंने भी दादा जी की तरह 'आगे' देख लिया होता, तो वे भी किसी के दिल में जगह बना पाते।
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रचनाकार
मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत




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सातारा (महाराष्ट्र)
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■ अदबी लफ़्जों ने ■ (गजल) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

■ अदबी लफ़्जों ने ■ (गजल) अदबी लफ़्ज़ों ने किरदार बनना छोड़ दिया है। जबसे लोगों ने असरदार बनना छोड़ दिया है। लिखते-बोलते गए, करते गए अपनी इब...

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