मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

■ हम बच्चे हैं नादान ■ (बालगीत) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

■ हम बच्चे हैं नादान ■

(बालगीत)

हम बच्चे हैं नादान,
करते हैं नादानी,
समझते हैं हम सब,
करते हैं आनाकानी।

कभी हँसते, कभी खेलते,
करते खूब शैतानी,
मम्मी-पापा समझाते,
बातें उनकी मानी।

गलती हो तो मानेंगे,
नहीं करेंगे मनमानी,
सही-गलत को पहचानेंगे,
छोड़ेंगे आनाकानी।

मिल-जुलकर हम रहते हैं,
सबसे करें भलाई,
सच्चाई का साथ निभाएँ,
यही हमारी अच्छाई।

हम बच्चे हैं नादान,
पर सीखेंगे सयानी,
सही बात को अपनाएँगे,
नहीं करेंगे मनमानी! 
■■■

08 सितंबर 2026 शाम 9:45 बजे
रचनाकार

● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-








■ आमची शाळा ■ (बालगीत) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

■ आमची शाळा ■

(बालगीत)

आमची शाळा, आमचा फळा
आमची मुले, आमचा मळा;
हा आमचा पसारा हो सगळा
इथे आनंदी आनंद वेगळा!

कोणी म्हणे चिऊताई
इकडे ये पाहू,
कोणी म्हणे काऊदादा
तूच माझा भाऊ,
इथे समद्यांना सगळ्यांचा लळा
इथे आनंदी.....

वही आणि पानांची
जमली येथे गट्टी
खडू आणि फळ्याला
नाही कधी सुट्टी
इथे गाण्यांना सुंदर गळा
इथे आनंदी....

कधी आम्ही रुसु
थोडं कोपऱ्यात बसू
गुरुजींचा पाठी हात
येई गालावर हसू
इथे मैत्रीचा रंग निराळा
इथे आनंदी....

किती आनंदाची शाळा
लावी आम्हांलाही लळा
स्वप्नांची ही माती तिचा
कपाळी हो टिळा
इथे नात्यांना गंध हो आगळा
इथे आनंदी....
■■■
07 अक्तूबर 2025 सुबह 8:30 बजे
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-







■ रावण ■ (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'



■ रावण ■
(कविता)

इस साल भी रावण का
दहन हो ही गया;
रावण मरता ही नहीं
फिर से पता चल ही गया;
अगले साल फिर रावण
को लाया जाएगा;
मरता रहेगा हर साल वो
फिर से पैदा होता जाएगा।
परंतु;
दो रावणों के बीच में 
कितनी ही कहीं कईं -
सीताएँ लूटी
लूटी माताएँ
बालिकाएँ लूटी
लूटी कोक कलिकाएँ;
और लूटा
किसीने अपनों को
किन्हीं के सपनों को
कभी आत्मविश्वास को
कभी विश्वास से श्वास को;
यह सिलसिला चलता रहा
हर कोई यहाँ लूटता रहा;
कभी महँगाई की मार से
बेरोजगारी की तलवार से
गरीबी और भूखमार से
कभी अमीरों के डकार से;
लूटी गई नौकरियाँ
छीनी गई टोकरियाँ
छीनी गई बोलियाँ
लूटी गई बालियाँ;
लूटता रहा देश
पहने सफेद भेष!
वो रावण फिर भी
असली रुप में आया था
मैं हूँ रावण, कहलाया था;
इनकी असलियत दिखाते हैं
ईडी से हमको धमकाते हैं!
अब तो लोकतंत्र ही लूट गया
पता नहीं कहाँ छूट गया;
लूटम-लूट चल रही है
रावणी टोली उठ रही है।
घर-गली से  शहर तक
गाँव से दिल्ली तक
रावण लूटाई जोरों पर है;
गिनते रहोगे कबतक
वे हजारों-करोडों पर हैं।
क्या इनका दहन 
कभी कोई कर पाएगा?
क्या मंदिर बनाने से 
वो राम और रामराज्य
फिर से आएगा?
अब.....
अपने अंदर के ही
राम को जगाना होगा
खुद बनकर राम ही
हर रावण को मिटाना होगा;
लूटम-लूट जब थम जाएगी
भारतमाता सच्चा दशहरा
तब एक बार ही मनाएगी।
नहीं तो हर साल 
रावण के पुतले जलते रहेंगे
उसकी हर चिंगारी से
हर दिन रावण पैदा होते जाएँगे
रावण मर गया, रावण मर गया
इस खुशी में खुदखुशी करते
खुशी-खुशी 
हम दीप दिवाली मनाएँगे...
■■■


21 अक्तूबर 2026 शाम 7:30 बजे
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-








■ हम बच्चे हैं नादान ■ (बालगीत) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

■ हम बच्चे हैं नादान ■ (बालगीत) हम बच्चे हैं नादान, करते हैं नादानी, समझते हैं हम सब, करते हैं आनाकानी। कभी हँसते, कभी खेलते, करते खूब शैतान...

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