मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

■ आज़ादी वैचारिक बंधनों से ■ (आलेख) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

 

■ आज़ादी वैचारिक बंधनों से ■
(आलेख)

    वर्तमान समय आपसी साझेदारी, सहयोग और परस्पर समझ का है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को सुखद, समृद्ध और पूर्ण बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत है। ऐसा होना भी स्वाभाविक है, क्योंकि हर मनुष्य सुख और आनंदपूर्ण जीवन जीना चाहता है। इसके लिए वह कठिन परिश्रम भी करता है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या उसे वास्तव में वह सुख और संतोष प्राप्त हो पाता है जिसकी वह अपेक्षा करता है? इसका उत्तर प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अपने भीतर खोजना होगा।

    यदि मैं व्यक्तिगत स्तर पर कहूँ, तो आज लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में पारिवारिक, सामाजिक तथा वैचारिक या मानसिक बंधनों से जुड़ा हुआ है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि पारिवारिक और सामाजिक दायित्व हमारे कर्तव्यों का अभिन्न अंग हैं। उनका निर्वहन करना प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है। यहाँ धर्म का अर्थ किसी संप्रदाय विशेष से नहीं, बल्कि कर्तव्यपरायणता और जीवन-पद्धति से है। इन दायित्वों का पालन हमारी भारतीय संस्कृति, परंपरा और संस्कारों की आधारशिला है।

    किंतु इन दायित्वों का निर्वहन करते-करते व्यक्ति अनेक प्रकार के बंधनों में जकड़ जाता है। एक सामाजिक व्यक्ति के लिए इनसे पूर्णतः मुक्त होना संभव नहीं होता। परिणामस्वरूप उसकी व्यक्तिगत खुशियाँ कहीं पीछे छूट जाती हैं। वह भीतर से व्यथित रहता है, किंतु अपनी पीड़ा किसी के सामने व्यक्त नहीं करता। चेहरे पर मुस्कान होती है और हृदय में अनेक वेदनाएँ छिपी रहती हैं, क्योंकि उसे ज्ञात होता है कि जीवन का बोझ उसे स्वयं ही उठाना है।

    क्या इस बोझ से मुक्ति संभव है? शायद पूर्णतः नहीं; परंतु इसे हल्का अवश्य किया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा सहारा हमारे 'स्वजन' हैं। व्यक्ति अपने प्रियजनों की खुशियों के लिए स्वयं कष्ट सह लेता है। इसलिए हमें यह समझना होगा कि परिवार में कोई भी व्यक्ति विशेष नहीं होता; हम सभी एक-दूसरे के साझेदार होते हैं। यदि हम एक-दूसरे का सहारा बनें, तो जीवन के अनेक बोझ स्वतः हल्के हो जाते हैं।

    मनुष्य के दुख का एक बड़ा कारण यह भी है कि वह अपनी आवश्यकताओं से अधिक अपेक्षाएँ अपने स्वजनों से करने लगता है। हमें एक बार स्वयं से यह प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए—जैसी अपेक्षाएँ हम अपने परिवार से रखते हैं, क्या उनकी अपेक्षाओं, परिस्थितियों और विवशताओं को भी उतना ही समझते हैं? यदि नहीं, तो संभव है कि वे भी भीतर ही भीतर संघर्ष कर रहे हों। परस्पर समझ, संवेदनशीलता और साझेदारी ही परिवार की वास्तविक शक्ति है। यदि हम अपने स्वजनों की खुशियों को अपनी खुशियाँ मान लें, तो उनके जीवन का भार भी हल्का होगा और हमारे संबंध अधिक मधुर बनेंगे। तब यह बंधन बोझ नहीं, बल्कि प्रेम और आत्मीयता का ऐसा बंधन बन जाएगा, जिससे कोई भी मुक्त होना नहीं चाहेगा।

    स्वजनों के प्रति अपने दायित्व निभाने के बाद व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है— 'वैचारिक स्वतंत्रता'। वास्तव में यही सच्ची आज़ादी है। आज समाज में मानवता, आत्मगौरव और नैतिकता का ह्रास दिखाई देता है, जिसका प्रमुख कारण वैचारिक जड़ता है। जो व्यक्ति वर्तमान का विवेकपूर्ण विश्लेषण करता है, उपलब्धियों और परिवर्तनों पर विचार करता है तथा भविष्यदृष्टि रखता है, वह आत्मगौरव का अनुभव करता है। किंतु अधिकांश लोग वैचारिक कैद में जीवन व्यतीत करते हैं।

    वैचारिक जकड़न के अनेक कारण हैं—आधुनिक जीवनशैली, तकनीकी परिवर्तन, सामाजिक अस्थिरता, सांस्कृतिक बदलाव, राजनीतिक उदासीनता और वैश्विक परिस्थितियाँ। इन सबके प्रभाव से व्यक्ति की सोच बदलती रहती है और कई बार वह सुविधा के अनुसार अपने विचार भी बदल लेता है। जब विचार और व्यवहार में द्वंद्व होता है, तब आत्मसम्मान और विश्वसनीयता दोनों प्रभावित होते हैं। कुछ लोग इससे व्यक्तिगत लाभ अवश्य प्राप्त कर लेते हैं, किंतु समाज में उनका सम्मान और गौरव स्थायी नहीं रह पाता। इसलिए हमें दोहरे आचरण से बचते हुए सत्यनिष्ठ और स्पष्ट विचारों को अपनाना चाहिए। एक सशक्त समाज के निर्माण के लिए यह अत्यंत आवश्यक है।

    व्यक्तिगत जीवन में भी समय-समय पर आत्मचिंतन करना आवश्यक है। सबसे पहले हमें यह समझना चाहिए कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है। जैसा विचार होगा, वैसा ही चरित्र निर्मित होगा। आज का मनुष्य स्वयं से अधिक दूसरों के जीवन, व्यवहार, उपलब्धियों और साधनों पर ध्यान देता है। वह निरंतर तुलना करता रहता है—मैं उससे कम हूँ या अधिक। यहीं से मानसिक अशांति और दुख का प्रारंभ होता है। फिर श्रेष्ठ बनने की प्रतिस्पर्धा शुरू होती है और उसके साथ वैचारिक संघर्ष भी। परिणामस्वरूप जीवन तनावों से भर जाता है।

    हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जीवन हमारा अपना है। जब हम उसे अनावश्यक रूप से सार्वजनिक बना देते हैं, तब आलोचनाएँ, अपेक्षाएँ और बाहरी हस्तक्षेप हमारे मानसिक संतुलन को प्रभावित करने लगते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम स्वयं के भीतर झाँकें और आनंद की खोज अपने जीवन में करें।

    इसका सरल उपाय हमारे लोकजीवन की प्रसिद्ध कहावत में निहित है— 'चादर देखकर पाँव पसारने चाहिए।' यहाँ चादर का अर्थ केवल आर्थिक क्षमता नहीं, बल्कि हमारी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और सामाजिक सामर्थ्य भी है। यदि हम अपनी क्षमताओं को पहचानकर जीवन का संतुलन बनाए रखें और निरंतर परिश्रम से उन्हें विकसित करें, तो वास्तविक स्वतंत्रता और आनंद का अनुभव कर सकते हैं।

    आज समाज अनेक समस्याओं से मुक्ति चाहता है, परंतु उन समस्याओं के समाधान की पहली शर्त है—वैचारिक आज़ादी। सकारात्मक सोच हर समस्या का समाधान खोजने की शक्ति देती है। नकारात्मक परिस्थितियाँ और लोग हमें विचलित करने का प्रयास अवश्य करेंगे, किंतु यदि हम अपने सिद्धांतों और जीवन-मूल्यों पर दृढ़ रहें, तो सफलता और सच्ची स्वतंत्रता दोनों हमारे जीवन का हिस्सा बन जाएँगी।

    आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर केवल बाहरी स्वतंत्रता का उत्सव न मनाएँ, बल्कि अपने मन, विचार और व्यवहार को भी संकीर्णताओं से मुक्त करने का संकल्प लें। क्योंकि वास्तविक आज़ादी वही है, जो मनुष्य को भीतर से स्वतंत्र, संतुलित और मानवीय बनाती है।

सबका मंगल हो।
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29 जुलाई 2026 शाम: 09.45 बजे
लेखक
मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'
अध्यापक-लेखक-संपादक
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ: गोंदिया (महाराष्ट्र)
मो. ९७३०४९१९५२
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● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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■ अदबी लफ़्जों ने ■ (गजल) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

■ अदबी लफ़्जों ने ■

(गजल)

अदबी लफ़्ज़ों ने किरदार बनना छोड़ दिया है।
जबसे लोगों ने असरदार बनना छोड़ दिया है।

लिखते-बोलते गए, करते गए अपनी इबादत,
औरों ने जबसे अपना बनाना छोड़ दिया है।

बहा दिया है हमने ख़ुद को पाक सलिला में,
जबसे इस दिल का आशियाना छोड़ दिया है।

कभी-कभी हवा से उतर आते हैं अंगूरी लता से,
ग़ज़ल में भरकर भरपूर पीने को छोड़ दिया है।

जो मेरे मीत बने, सदा संगी बने अकेली रातों के,
'मंजीते' जोड़ता रहा उन्हें, जो वक़्त ने छोड़ दिया है।
-०-

16 जनवरी 2026 शाम: 09.10 बजे


इंदौर समाचार पत्र में 22 जुलाई 2026 को प्रकाशित


रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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■ पाती आदरणीय श्रीमान विशाल डोंगरे साहब (गुटशिक्षाधिकारी, सालेकसा) जी के नाम ■


■ पाती आदरणीय श्रीमान विशाल डोंगरे साहब (गुटशिक्षाधिकारी, सालेकसा) जी के नाम ■ 


दिनांक: ०५ जुलाई २०२६

आदरणीय श्रीमान विशाल एस. डोंगरे साहब
उपशिक्षाधिकारी, जिला परिषद नागपुर

सादर प्रणाम।
      आपके जिला परिषद नागपुर में उपशिक्षाधिकारी के रूप में नियुक्त होने का शुभ समाचार सुनकर हृदय अपार हर्ष, गर्व और संतोष से भर गया। इस गौरवपूर्ण उपलब्धि पर आपको हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ।

       सर, आप मिलनसार, मितभाषी, सरल, सहयोगी एवं प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत कुशल स्वभाव के धनी है। आपने सदैव पद की गरिमा को बनाए रखते हुए सभी शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के साथ आत्मीयता और सौहार्दपूर्ण व्यवहार किया। आपके इसी व्यक्तित्व ने आपको हम सभी के हृदय में एक विशेष स्थान दिलाया है।

       मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ कि शिक्षण सेवक के रूप में दो वर्षों तक आपके मार्गदर्शन में कार्य करने का अवसर मिला। इस अल्प अवधि में आपने विद्यार्थियों के हित में नए-नए उपक्रम करने, विद्यालय को निरंतर प्रगतिशील बनाने तथा स्वयं को सदैव सक्रिय रखने की जो प्रेरणा दी, वह मेरे जीवन की अमूल्य पूँजी है।

       हमारी जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर में प्रशासकीय कार्यों के सिलसिले में आपका अनेक बार आगमन हुआ। प्रत्येक भेंट में आपने विद्यालय के कार्यों की सराहना की, आवश्यक मार्गदर्शन दिया तथा विद्यार्थियों और शिक्षकों का उत्साहवर्धन किया। आपके प्रोत्साहन के शब्द आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

       केंद्र, तालुका एवं जिला स्तरीय क्रीड़ा सम्मेलनों में आपकी गरिमामयी उपस्थिति सदैव हम सभी के लिए प्रेरणादायी और उत्साहवर्धक रही। आपकी उपस्थिति मात्र से शिक्षकों और विद्यार्थियों में नया आत्मविश्वास जागृत हो जाता था।

      प्रशासकीय कार्यों में आपने सदैव सभी को साथ लेकर चलने का प्रयास किया। आपने हर शिक्षक को सम्मान दिया, परामर्श दिया और कठिन परिस्थितियों में भी सहयोग का हाथ कभी पीछे नहीं खींचा। प्रशिक्षण स्थलों पर शिक्षकों को उत्तरदायित्व का बोध कराते हुए जिस आत्मीयता से उनका मार्गदर्शन किया, वह वास्तव में अनुकरणीय है।

      व्यक्तिगत रूप से जब-जब हमारी शैक्षिक चर्चाएँ हुईं, आपने सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने, निरंतर नवाचार करने और विद्यार्थियों के हित को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा दी। आपकी यही सीख आज भी मुझे प्रतिदिन कुछ नया और बेहतर करने की ऊर्जा प्रदान करती है।

       आपसे प्रत्येक मुलाकात केवल औपचारिक नहीं होती थी। विद्यालय, विद्यार्थियों और नवीन शैक्षिक उपक्रमों पर चर्चा के साथ-साथ पारिवारिक आत्मीयता का जो स्नेह आपने दिया, वह सदैव स्मरणीय रहेगा। आपके परिवार के साथ बेवारटोला बाँध की वह सुखद सैर भी जीवन की मधुर स्मृतियों में सदैव संजोई रहेगी।

      आप सदैव रत्न पारखी रहे हैं। आपने अच्छे कार्यों की खुलकर प्रशंसा की और जहाँ सुधार की आवश्यकता रही, वहाँ उचित परामर्श देकर आगे बढ़ने का मार्ग दिखाया। कार्य में कहीं कमी दिखाई देने पर आपका कठोर रूप भी हमने देखा, किंतु वह किसी व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार प्रशासक के रूप में व्यवस्था और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए था। यही आपकी निष्पक्षता और कार्यनिष्ठा का प्रमाण है।

      हमारे द्वारा किए गए प्रत्येक छोटे-बड़े कार्य की आपने सराहना की, मार्गदर्शन दिया और आगे बढ़ने का आत्मविश्वास प्रदान किया। आपके उत्साहवर्धन ने हमें सदैव और बेहतर कार्य करने की नई ऊर्जा दी।

      सर, आपका हमारे सालेकसा क्षेत्र से जाना हम सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए निश्चित एक बड़ी क्षति है। आपके जैसा स्नेही, प्रेरणादायी एवं दूरदर्शी अधिकारी मिलना सौभाग्य की बात होती है। फिर भी हमें पूर्ण विश्वास है कि आप जहाँ भी रहेंगे, वहाँ भी अपनी कार्यकुशलता, संवेदनशीलता और नेतृत्व से शिक्षा जगत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाएँगे।

      हम सदैव आपके स्नेह, मार्गदर्शन और आशीर्वाद के आकांक्षी रहेंगे। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपके नवीन दायित्वों में आपको निरंतर सफलता प्राप्त हो, आप उत्तरोत्तर प्रगति के नए शिखरों को स्पर्श करें तथा शिक्षा क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान और अधिक सुदृढ़ करें।

       आपको एवं आपके समस्त परिवार को सफलतम भविष्य, उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुख-समृद्धि एवं निरामय जीवन की मंगलकामनाएँ। साथ ही आपकी प्यारी बिटिया को ढेर सारा स्नेह, प्यार और उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक आशीर्वाद।
       पुनः हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ।

आपका कृपाभिलाषी
मच्छिंद्र बापू भिसे
जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर
सालेकसा, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952

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■ आज़ादी वैचारिक बंधनों से ■ (आलेख) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

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