मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

■ मैं पथ हूँ ■ (गीत) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

 

■ मैं पथ हूँ ■

(गीत)

मैं पथ हूँ; पथिक प्यारे
किसी को मैं न रुकाता हूँ
जी-जान से जो चलने वाले
सिर उनके न झुकाता हूँ।
मैं पथ हूँ...

चलते रहो पथिक तुम
मंजिल तेरी कुछ आगे है
रुकने का तू नाम न ले
डरकर तू क्यों भागे है
डगमग पग हो चाहे जितने
कभी उन्हें न गिराता हूँ।
मैं पथ हूँ...

आशा के हिलोर भर तू
वक्त को भी पहचान ले
अंत उसका कभी न होता
खुद ही को जो पहचान ले
खुलता रहूँगा उनके खातिर
किसी को किनारे न कराता हूँ
मैं पथ हूँ....

अब तेरे हाथ है तेरी मंजिल
तू ही उसको पाएगा
करना मत बदनाम मुझको
वरना हर बार पछताएगा
तू ही तेरे जाल में फँसेगा
मैं खुद काँटे न बिछाता हूँ।
मैं पथ हूँ...
-०-
4 अक्तूबर 2026 शाम 4:30
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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■ कोंकण की सैर■ (बाल कहानी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

कोंकण की सैर



(कहानी

रविवार की सुबह थी। आसमान में हल्के बादल छाए हुए थे। घर के आँगन में आम के पेड़ के नीचे दादा जी आराम से बैठे अखबार पढ़ रहे थे। तभी उनके पोते राखी और पोती स्वस्तिक दौड़ते हुए उनके पास आए।

“दादा जी! इस बार छुट्टियों में हम कहाँ घूमने जाएँगे?” स्वस्तिक ने उत्सुकता से पूछा।

दादा जी ने अखबार नीचे रखा और मुस्कुराते हुए बोले, “अगर तुम दोनों तैयार हो, तो इस बार तुम्हें महाराष्ट्र के एक बहुत सुंदर क्षेत्र की सैर कराता हूँ।”

“कहाँ?” राखी ने तुरंत पूछा।

“कोंकण!” दादा जी ने कहा।

“कोंकण? वह कहाँ है?” स्वस्तिक ने पूछा।

दादा जी बोले, “महाराष्ट्र के पश्चिमी भाग में अरब सागर के किनारे फैला हुआ क्षेत्र कोंकण कहलाता है। इसके एक ओर समुद्र है और दूसरी ओर सह्याद्रि की पर्वत-श्रेणियाँ। इसलिए यहाँ समुद्र, पहाड़, नदियाँ, झरने, हरे-भरे जंगल और सुंदर गाँव—सब एक साथ देखने को मिलते हैं।”

राखी ने आश्चर्य से कहा, “तो क्या वहाँ समुद्र भी है और पहाड़ भी?”

“हाँ,” दादा जी हँसते हुए बोले, “यही तो कोंकण की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है।”

कुछ दिनों बाद दादा जी, स्वस्तिक और राखी कोंकण की यात्रा पर निकल पड़े। जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते गए, रास्ते का प्राकृतिक दृश्य बदलता गया। ऊँचे-ऊँचे पहाड़, घने पेड़, छोटी-छोटी नदियाँ और दूर तक फैली हरियाली दिखाई देने लगी।

स्वस्तिक खिड़की से बाहर देखते हुए बोला, “दादा जी, यहाँ तो चारों ओर हरियाली ही हरियाली है!”

“हाँ बेटा,” दादा जी ने कहा, “कोंकण में वर्षा अच्छी होती है। वर्षाऋतु में यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य और भी बढ़ जाता है। पहाड़ों से गिरते झरने, हरे-भरे खेत और बादलों से ढकी चोटियाँ मन को मोह लेती हैं।”

राखी ने पूछा, “क्या यहाँ बहुत से पेड़ भी होते हैं?”

“हाँ। यहाँ नारियल, सुपारी, आम, काजू और कटहल के पेड़ बहुत दिखाई देते हैं। कोंकण के हापुस आम तो बहुत प्रसिद्ध हैं।”

स्वस्तिक खुशी से बोला, “मुझे तो आम बहुत पसंद हैं। क्या हम हापुस आम खा सकते हैं?”

दादा जी हँस पड़े। “क्यों नहीं! कोंकण की यात्रा आम के बिना अधूरी है।”

थोड़ी देर बाद वे समुद्र के किनारे पहुँचे। सामने दूर-दूर तक फैला नीला समुद्र दिखाई दे रहा था। लहरें बार-बार किनारे से टकरा रही थीं।

राखी खुशी से बोली, “वाह! समुद्र कितना बड़ा है! इसकी कोई सीमा ही दिखाई नहीं दे रही।”

दादा जी बोले, “समुद्र कोंकण के जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ अनेक लोग मछली पकड़ने का काम करते हैं। समुद्र के किनारे बसे गाँवों में मछुआरों का जीवन भी देखने को मिलता है।”

स्वस्तिक ने पूछा, “दादा जी, क्या यहाँ के लोग समुद्र से डरते नहीं हैं?”

“समुद्र शक्तिशाली है,” दादा जी ने समझाया, “इसलिए उसके स्वभाव को समझना जरूरी है। मछुआरे मौसम और समुद्र की स्थिति को ध्यान में रखकर अपनी नावें समुद्र में ले जाते हैं। उनका जीवन मेहनत और साहस से भरा होता है।”

समुद्र की लहरों को देखते-देखते बच्चे आगे बढ़े। कुछ दूरी पर उन्हें एक ऊँचा किला दिखाई दिया।

“दादा जी! वह क्या है?” स्वस्तिक ने पूछा।

“वह किला है। कोंकण केवल प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के लिए भी प्रसिद्ध है।”

“कौन-कौन से किले हैं यहाँ?” राखी ने पूछा।

दादा जी ने कहा, “कोंकण क्षेत्र में अनेक प्रसिद्ध समुद्री और पहाड़ी किले हैं। सिंधुदुर्ग, विजयदुर्ग और रायगढ़ जैसे किले महाराष्ट्र के इतिहास की महत्त्वपूर्ण पहचान हैं।”

“सिंधुदुर्ग किला समुद्र में है क्या?” स्वस्तिक ने उत्सुकता से पूछा।

“हाँ,” दादा जी बोले, “सिंधुदुर्ग किला समुद्र में एक द्वीप पर बनाया गया है। इसे छत्रपति शिवाजी महाराज ने बनवाया था। यह किला समुद्र की ओर से होने वाले आक्रमणों से सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण था।”

राखी ने कहा, “इतने बड़े समुद्र के बीच किला बनाना कितना कठिन रहा होगा!”

दादा जी ने कहा, “बिल्कुल। उस समय आधुनिक मशीनें नहीं थीं। फिर भी कुशल कारीगरों और मेहनती लोगों ने मजबूत किले बनाए। इससे हमें उस समय की स्थापत्य-कला, योजना और मेहनत का पता चलता है।”

इसके बाद वे रायगढ़ की ओर गए। रास्ते में दादा जी ने बच्चों को छत्रपति शिवाजी महाराज के इतिहास के बारे में बताया।

“रायगढ़ केवल एक किला नहीं है,” दादा जी बोले, “यह मराठा इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण धरोहर है। छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का संबंध भी रायगढ़ से है। इसलिए इसका ऐतिहासिक महत्त्व बहुत अधिक है।”

स्वस्तिक ने पूछा, “दादा जी, क्या कोंकण में केवल किले ही हैं?”

“नहीं बेटा,” दादा जी बोले, “यहाँ अनेक प्राचीन मंदिर, गुफाएँ, पुराने भवन और अन्य ऐतिहासिक स्थल भी हैं। ये हमारी संस्कृति और इतिहास की कहानी बताते हैं।”

यात्रा के दौरान बच्चों ने कोंकण के गाँवों को भी देखा। छोटे-छोटे घर, नारियल और सुपारी के पेड़, खेत और साफ-सुथरे रास्ते देखकर उन्हें बहुत अच्छा लगा।

एक गाँव में उन्हें स्थानीय भोजन खाने का अवसर मिला।

राखी ने पूछा, “दादाजी, यहाँ के भोजन में नारियल का उपयोग इतना अधिक क्यों होता है?”

दादा जी बोले, “क्योंकि कोंकण में नारियल के पेड़ बहुत होते हैं। यहाँ की भोजन-परंपरा पर स्थानीय जलवायु और उपलब्ध फसलों का प्रभाव दिखाई देता है। चावल, नारियल, मछली और विभिन्न स्थानीय मसाले यहाँ के भोजन का हिस्सा हैं।”

स्वस्तिक ने कहा, “यहाँ का जीवन तो प्रकृति के बहुत करीब है।”

“बिल्कुल,” दादा जी ने कहा। “लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि प्रकृति केवल देखने के लिए नहीं है। उसकी रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है।”

राखी ने पूछा, “हम प्रकृति की रक्षा कैसे कर सकते हैं?”

दादा जी बोले, “समुद्र में कचरा नहीं फेंकना चाहिए, प्लास्टिक का कम उपयोग करना चाहिए, पेड़-पौधों को बचाना चाहिए और ऐतिहासिक स्थलों की दीवारों पर कुछ लिखना या उन्हें नुकसान पहुँचाना नहीं चाहिए।”

स्वस्तिक ने कहा, “यानी कोंकण हमें सुंदरता के साथ जिम्मेदारी का पाठ भी सिखाता है।”

दादा जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बिल्कुल! कोंकण केवल समुद्र और पहाड़ों का नाम नहीं है। यह प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और मेहनती लोगों की भूमि है।”

शाम होने लगी थी। समुद्र के किनारे सूर्य धीरे-धीरे नीचे जा रहा था। आकाश में लाल, नारंगी और सुनहरे रंग बिखर गए थे। समुद्र की लहरों पर सूर्य की किरणें चमक रही थीं।

राखी कुछ देर चुपचाप उस दृश्य को देखती रही। फिर बोली, “दादा जी, कोंकण सचमुच बहुत सुंदर है। यहाँ समुद्र है, पहाड़ हैं, झरने हैं, पेड़ हैं और पुराने किले भी।”

स्वस्तिक ने कहा, “और यहाँ का इतिहास भी बहुत रोचक है।”

दादा जी ने दोनों बच्चों के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “याद रखो बच्चों, किसी स्थान को जानना केवल वहाँ घूमना नहीं है। उसके प्राकृतिक वातावरण, इतिहास, संस्कृति और लोगों को समझना भी जरूरी है। जब हम अपनी धरती और विरासत को समझते हैं, तभी हमें उसकी रक्षा करने का महत्त्व पता चलता है।”

      सूर्य अस्त हो चुका था। समुद्र की लहरों की आवाज अब भी सुनाई दे रही थी। बच्चों के मन में कोंकण की सुंदर यादें बस चुकी थीं। उन्हें समझ आ गया था कि महाराष्ट्र का कोंकण क्षेत्र केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति, इतिहास और संस्कृति का सुंदर संगम है।
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2 अगस्त 2026 शाम: 08.१५ बजे
लेखक : मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'
अध्यापक-लेखक-संपादक
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ: गोंदिया (महाराष्ट्र)
मो. ९७३०४९१९५२
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● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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■ पंढरपुर की वारी — महाराष्ट्र की एकता का प्रतीक ■ (एकांकी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

पंढरपुर की वारी — महाराष्ट्र की एकता का प्रतीक


पात्र:

  • शिक्षक
  • आरव
  • स्नेहा
  • रोहन

स्थान: विद्यालय की कक्षा-कक्ष
समय: प्रार्थना सभा के बाद
दृश्य: कक्षा में शिक्षक के आसपास विद्यार्थी बैठे हैं। बाहर से हल्के भजन और ताल-मृदंग की आवाज सुनाई देती है।


दृश्य आरंभ

(मंच पर शिक्षक बैठे हैं। आरव, स्नेहा और रोहन आपस में बातचीत कर रहे हैं। बाहर से “ज्ञानोबा-तुकाराम” का जयघोष सुनाई देता है।)

आरव: (आश्चर्य से) अरे! यह कैसी आवाज आ रही है? कोई भजन-कीर्तन हो रहा है क्या?

स्नेहा: हाँ, मुझे भी सुनाई दे रहा है। लगता है, वारी के लोग जा रहे हैं।

रोहन: वारी? वह क्या होती है? मैंने इसका नाम तो सुना है, लेकिन ठीक से पता नहीं।

शिक्षक: (मुस्कुराते हुए) बहुत अच्छा प्रश्न, रोहन! आज हम इसी विषय पर बात करेंगे। बताओ, पंढरपुर की वारी के बारे में तुम लोगों ने क्या सुना है?

आरव: सर, मैंने सुना है कि लोग पैदल चलकर पंढरपुर जाते हैं और भगवान विठ्ठल के दर्शन करते हैं।

शिक्षक: बिल्कुल सही। पंढरपुर की वारी महाराष्ट्र की एक प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है। इसमें अलग-अलग गाँवों और शहरों से हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं।

स्नेहा: सर, ये लोग इतनी लंबी यात्रा पैदल क्यों करते हैं?

शिक्षक: यह उनकी भगवान विठ्ठल के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। यात्री भजन, कीर्तन और अभंग गाते हुए आगे बढ़ते हैं। इस यात्रा में संत ज्ञानेश्वर महाराज और संत तुकाराम महाराज की पालखियों का विशेष महत्व है।

रोहन: पालखी में क्या होता है?

शिक्षक: पालखी में संतों की पादुकाएँ रखी जाती हैं। भक्त पालखी के साथ अनुशासनपूर्वक चलते हैं और “ज्ञानोबा-तुकाराम” का जयघोष करते हैं।

(तीनों विद्यार्थी उत्सुकता से शिक्षक की ओर देखते हैं।)

आरव: सर, वारी में तो अलग-अलग जगहों के लोग आते होंगे। फिर वे सब एक साथ कैसे रहते हैं?

शिक्षक: यही तो वारी की सबसे बड़ी विशेषता है! इसमें किसान, मजदूर, व्यापारी और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग एक साथ चलते हैं। वे एक-दूसरे की सहायता करते हैं और मिल-जुलकर यात्रा पूरी करते हैं।

स्नेहा: यानी वहाँ किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता?

शिक्षक: वारी का संदेश ही समानता और भाईचारे का है। कोई किसी को पानी पिलाता है, कोई भोजन देता है और कोई थके हुए यात्री की सहायता करता है। इस तरह सेवा और सहयोग की भावना दिखाई देती है।

रोहन: अब समझ में आया कि वारी को महाराष्ट्र की एकता का प्रतीक क्यों कहा जाता है।

शिक्षक: बिल्कुल! वारी हमें सिखाती है कि सबको साथ लेकर चलना चाहिए। हम अलग-अलग स्थानों से आए हों, हमारी भाषा या परिस्थितियाँ अलग हों, फिर भी हम एक-दूसरे के साथ मिलकर रह सकते हैं।

आरव: सर, क्या हम विद्यार्थी भी वारी से कुछ सीख सकते हैं?

शिक्षक: अवश्य! हमें अपने मित्रों की सहायता करनी चाहिए, सभी का सम्मान करना चाहिए, भेदभाव नहीं करना चाहिए और विद्यालय को स्वच्छ रखना चाहिए।

स्नेहा: यानी वारी हमें केवल भक्ति ही नहीं, बल्कि अच्छे इंसान बनने की सीख भी देती है।

शिक्षक: बिल्कुल सही। वारी हमें प्रेम, समानता, सेवा, सहयोग, अनुशासन और मानवता का संदेश देती है।

रोहन: सर, अगर वारी का संदेश एक वाक्य में कहना हो तो?

शिक्षक: (भावपूर्ण स्वर में)
“मिल-जुलकर चलो, एक-दूसरे का साथ दो और सभी का सम्मान करो।”

(कुछ क्षण का मौन। बाहर से फिर 'ज्ञानोबा-तुकाराम' का जयघोष सुनाई देता है।)

आरव: सर, अब जब भी मैं वारी का नाम सुनूँगा, मुझे केवल पंढरपुर की यात्रा नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की एकता याद आएगी।

स्नेहा: और मुझे सेवा तथा सहयोग की भावना याद आएगी।

रोहन: मुझे याद रहेगा—सबको साथ लेकर चलना है।

शिक्षक: शाबाश बच्चों! यही पंढरपुर की वारी का सच्चा संदेश है।

(सभी विद्यार्थी एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे आते हैं।)

सभी:

'ज्ञानोबा-तुकाराम!'

'एकता और मानवता की जय!'

(पृष्ठभूमि में हल्का भजन बजता है। सभी पात्र मंच से बाहर जाते हैं।)

— एकांकी समाप्त —

25 जुलाई 2026 शाम: 04.00 बजे
लेखक : मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'
अध्यापक-लेखक-संपादक
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ: गोंदिया (महाराष्ट्र)
मो. ९७३०४९१९५२


11 अगस्त 2026 दैनिक इंदौर समाचार में

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● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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■ मैं पथ हूँ ■ (गीत) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

  ■ मैं पथ हूँ ■ (गीत) मैं पथ हूँ; पथिक प्यारे किसी को मैं न रुकाता हूँ जी-जान से जो चलने वाले सिर उनके न झुकाता हूँ। मैं पथ हूँ... चलते रहो...

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