मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

■ समीक्षा: कृति - ‘हाड़ौती अंचल का बालसाहित्य : उद्भव एवं विकास’, लेखिका : डॉ. श्रीमती युगल ■ समीक्षक : मच्छिंद्र बापू भिसे ‘मंजीत’

■ कृति समीक्षा ■

कृति : ‘हाड़ौती अंचल का बालसाहित्य : उद्भव एवं विकास’
लेखिका : डॉ. श्रीमती युगल सिंह
समीक्षक : मच्छिंद्र बापू भिसे ‘मंजीत’

भूमिका:
        समय कभी रुकता नहीं। मनुष्य समय के साथ निरंतर आगे बढ़ता रहता है, परंतु काल के गर्भ में अनेक घटनाएँ, कथाएँ और इतिहास दब जाते हैं। ऐसे में किसी जिजीविषा से परिपूर्ण, प्रज्ञाचक्षु प्रतिभा का मन बीते समय में झाँकने का प्रयास करता है। अपनी श्रम-साधना से वह रिद्धि-सिद्धि प्राप्त कर इतिहास को मुखर बना देता है, जो वर्तमान तथा भविष्य को दिशा प्रदान करता है। इतिहास की खोज स्वयं में एक कठिन कार्य है और उसका लेखन कर उसे शुद्ध मानकों तथा तथ्यों की कसौटी पर खरा उतारना अत्यंत श्रमसाध्य, श्रद्धामय एवं समर्पित कार्य है।

        हिंदी साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते जब मैंने हिंदी साहित्य के इतिहास का अध्ययन किया, तब एक कमी सदैव अनुभव हुई—वह थी बालसाहित्य की उपेक्षा। हिंदी साहित्य के इतिहासकार गार्सा-द-तासी से लेकर डॉ. नगेंद्र तक की ऐतिहासिक कृतियों में बालसाहित्य अपेक्षाकृत उपेक्षित रहा है। ऐसा नहीं है कि स्वतंत्र रूप से बालसाहित्य के इतिहास-लेखन का प्रयास नहीं हुआ। आधुनिक काल में ऐसे प्रयास हुए हैं, किंतु वे अधिकांशतः पुस्तकों तक सीमित रह गए। उन्हें शैक्षिक, साहित्यिक एवं शासकीय स्तर पर उचित मान्यता और संरक्षण प्राप्त होना अभी शेष है।

        बालसाहित्य के इतिहास-लेखन के संदर्भ में जब मैंने प्रकाश मनु जी के कार्यों के बारे में पढ़ा, तब यह अनुभव हुआ कि यह क्षेत्र अत्यंत आशाजनक एवं प्रेरणादायी है। कुछ ही दिन पूर्व मुझे डॉ. श्रीमती युगल सिंह द्वारा लिखित ‘हाड़ौती अंचल का बालसाहित्य : उद्भव एवं विकास’ कृति प्राप्त हुई। यह मेरे लिए अत्यंत सुखद अनुभव रहा। बालसाहित्य और विशेषतः किसी अंचल एवं भाषा-विशेष के बालसाहित्य का इतिहास-लेखन सामने आना अत्यंत सराहनीय कार्य है। इस संपूर्ण कृति के अध्ययन के पश्चात यह अनुभव हुआ कि डॉ. श्रीमती युगल सिंह ने वर्षों के अथक परिश्रम से असाध्य को साध्य कर इस क्षेत्र को विशेष स्थान दिलाने का कार्य किया है। वास्तव में वे अभिनंदन एवं सराहना की पात्र हैं।
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कृति समीक्षा:
        हमारी सोच, चिंतन, अभ्यास, लगन और परिश्रम हमें वांछित लक्ष्य तक पहुँचा ही देते हैं। डॉ. श्रीमती युगल सिंह की यह कृति इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। शोधकार्य से प्रारंभ हुई यात्रा एक ऐतिहासिक कृति का रूप ले सकती है—यह आदर्श उन्होंने प्रस्तुत किया है। पाँच वर्षों तक शोधार्थी के रूप में हाड़ौती अंचल के बालसाहित्यकारों पर शोध-कार्य करने के उपरांत उनके मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि इस क्षेत्र का इतिहास-लेखन भी होना चाहिए। वरिष्ठ साहित्यकारों का प्रोत्साहन, प्रेरणा एवं मार्गदर्शन मिलने से यह कार्य और अधिक सशक्त हुआ तथा लेखिका ने अपनी अथक मेहनत से इसे मूर्त रूप प्रदान किया।

        प्रस्तुत ‘हाड़ौती अंचल का बालसाहित्य : उद्भव एवं विकास’ कृति न केवल हाड़ौती अंचल, बल्कि समूचे राजस्थान को गौरवान्वित करती है। साथ ही यह देशभर के साहित्य-प्रेमियों, पाठकों और रचनाकारों के लिए बालसाहित्य की ओर देखने, उसे परखने तथा नवसृजन की प्रेरणा प्रदान करती है। निःसंदेह यह कृति अन्य अंचलों के साहित्य-मनीषियों को भी इस दिशा में इतिहास-लेखन हेतु प्रेरित करेगी।

        यह कृति बालसाहित्य के इतिहास-लेखन का आदर्श नमूना है। कृति की भूमिका में बालसाहित्य के श्रेष्ठ रचनाकार दिविक रमेश ने अपने संक्षिप्त किंतु सारगर्भित शब्दों में लेखिका को शुभकामनाएँ दी हैं। वहीं हिंदी, राजस्थानी एवं हाड़ौती भाषा पर समान अधिकार रखने वाले वरिष्ठ साहित्यकार जितेंद्र निर्मोही का अभिमत पाठक को कृति पढ़ने हेतु प्रेरित करता है। स्वयं लेखिका ने विषय-चयन से लेकर कृति-निर्माण तक की यात्रा को संक्षेप में प्रस्तुत किया है, जो अत्यंत प्रेरणादायी है।

        डॉ. श्रीमती युगल सिंह ने इतिहास-लेखन की पद्धति का सफल निर्वाह करते हुए प्रत्येक तत्व को तथ्यों सहित प्रस्तुत किया है। प्रथम प्रकरण में ‘हाड़ौती’ शब्द की व्याख्या करते हुए हाड़ौती अंचल का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। इसमें हाड़ौती अंचल के चार जिलों, उनकी ऐतिहासिकता, संस्कृति, भाषा तथा जनजीवन का परिचय सरल एवं प्रभावी शैली में प्रस्तुत किया गया है।

        बालक के विकास में जन्मपूर्व संस्कारगीतों से लेकर लोरियों तक की परंपरा बालसाहित्य की आत्मा है। लेखिका ने बालसाहित्य को बच्चों की उमंग, अनुभूतियों एवं जिज्ञासाओं की अभिव्यक्ति बताया है। अध्यापिका होने के कारण उनका बालमन से सतत संवाद रहा है। वे मानती हैं कि बालसाहित्य तभी सफल माना जाएगा, जब उसमें बालक की दृष्टि और संवेदना प्रतिबिंबित हो।

        इस कृति में बालसाहित्य की परिभाषा एवं स्वरूप स्पष्ट करते हुए अनेक ऐतिहासिक तथ्यों तथा साहित्यकारों के विचारों का उल्लेख किया गया है, जो इसकी प्रामाणिकता को सिद्ध करते हैं। लेखिका ने केवल हाड़ौती अंचल तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि हिंदी बालसाहित्य की व्यापक परंपरा का परिचय देते हुए हाड़ौती बालसाहित्य को उसके व्यापक संदर्भों में स्थापित किया है।

        ‘हाड़ौती अंचल का बालसाहित्य और साहित्य के विकास का स्वरूप’ शीर्षक के अंतर्गत डॉ. श्रीमती युगल सिंह ने विभिन्न स्रोतों के आधार पर शोधपरक लेखन का सफल प्रयास किया है। उनके अनुसार स्वतंत्रता-पूर्व काल में हाड़ौती अंचल का बालसाहित्य संगठित रूप में उपलब्ध नहीं मिलता। यह साहित्य मुख्यतः मौखिक परंपरा—जैसे हालरा (लोरियाँ), लोकगीत एवं पहेलियों—में बिखरा हुआ था। स्वतंत्रता के पश्चात उपलब्ध लिखित एवं तथ्याधारित साहित्य का उन्होंने विभिन्न विधाओं के माध्यम से परिचय कराया है।

        लेखिका ने अपनी खोज के आधार पर हाड़ौती बोली में उपलब्ध बालसाहित्य को यथासंभव प्रकाश में लाने का प्रयास किया है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि हाड़ौती बोली में अधिकाधिक बालसाहित्य सृजित होना चाहिए। कृति में हाड़ौती तथा हिंदी भाषा में रचित विभिन्न विधाओं के साहित्य का परिचय सहज एवं प्रभावी शैली में प्रस्तुत किया गया है, जिससे पाठक स्वयं उन रचनाओं को पढ़ने हेतु प्रेरित होता है।

        हाड़ौती अंचल के बालसाहित्य का परिचय देते हुए सर्वप्रथम कविता-विधा का विवेचन किया गया है। कविता-विधा के अंतर्गत लगभग 28 रचनाकारों की साहित्यिक कृतियों तथा उनकी बाल-कविताओं का परिचय कराया गया है। विभिन्न कविता-संग्रहों एवं कविताओं के भावों को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है तथा उदाहरणस्वरूप कवितांश भी दिए गए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि लेखिका ने प्रत्येक रचनाकार की कृतियों का गंभीर अध्ययन कर ही यह विवेचन प्रस्तुत किया है।

        बाल-कहानियों के संदर्भ में लेखिका ने बालमन तथा संस्कार-निर्माण में उनकी भूमिका को स्पष्ट किया है। इस क्रम में अरनी रॉबर्ट्स, सी. एल. सांखला, डॉ. क्षमा चतुर्वेदी, डॉ. नरेंद्र नाथ चतुर्वेदी, डॉ. रघुराज सिंह कर्मयोगी, रेखा पंचौली, टीकम चंदर ढोडारिया, विजय जोशी तथा विजय शर्मा आदि रचनाकारों की कहानियों एवं कृतियों का उल्लेख किया गया है। लेखिका ने कहानी-विशेष की सीख और उसके बालोपयोगी तत्वों को भी रेखांकित किया है।

        बाल-उपन्यास लेखन को श्रमसाध्य कार्य बताते हुए लेखिका ने हाड़ौती अंचल के बाल-उपन्यासकारों का उल्लेख किया है। विशेष रूप से डॉ. नरेंद्र नाथ चतुर्वेदी और प्रज्ञा गौतम के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने इस क्षेत्र में और अधिक कार्य होने की आवश्यकता बताई है।

        बालसाहित्य की महत्वपूर्ण विधा ‘नाटक’ पर भी लेखिका ने गंभीरता से विचार किया है। इस क्रम में राम शर्मा और योगेश यथार्थ का विशेष उल्लेख है। ‘आई एम सॉरी’ नाटक की संक्षिप्त समीक्षा प्रभावशाली है, वहीं ‘रूपक रत्नाकर’ में ऐतिहासिक पात्रों को पुनर्जीवित करने के प्रयास को सराहा गया है।

        लेखिका का स्वयं नाट्यकला से जुड़ाव रहा है। उन्होंने अहिल्याबाई होळकर के जीवन पर आधारित राम शर्मा के नाटक में अभिनय भी किया है। इससे उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का बहुआयामी स्वरूप सामने आता है।

        इस कृति में प्रमुख विधाओं के अतिरिक्त ज्ञान-विज्ञान संबंधी पुस्तकें, आत्मकथात्मक लेखन, हाड़ौती पहेलियाँ, लोककथाएँ, लोरियाँ, हास्य-रचनाएँ, बालसाहित्य अनुवाद, बाल-पत्रिकाएँ तथा समीक्षात्मक साहित्य का भी उल्लेख किया गया है। लेखिका की यह व्यापक दृष्टि कृति को और अधिक महत्वपूर्ण बना देती है।

        अंतिम अध्याय में हाड़ौती अंचल के बालसाहित्यकारों का संक्षिप्त जीवन-परिचय, उनकी कृतियाँ एवं प्राप्त सम्मान दिए गए हैं। इससे कृति की ऐतिहासिकता और प्रामाणिकता पुष्ट होती है। संदर्भों का सुव्यवस्थित उल्लेख भी इसकी तथ्यपरकता को प्रमाणित करता है।
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उपसंहार :
        डॉ. श्रीमती युगल सिंह द्वारा रचित ‘हाड़ौती अंचल का बालसाहित्य : उद्भव एवं विकास’ ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण एवं सफल कृति है। साहित्य-इतिहास लेखन के सभी आवश्यक तत्वों का समुचित समावेश इसमें दिखाई देता है। हाड़ौती भाषा में बालसाहित्य अपेक्षाकृत कम उपलब्ध होने के बावजूद लेखिका ने शोधपरक दृष्टि से उसे खोजकर सामने लाने का सराहनीय कार्य किया है।

        यह कृति केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी अध्ययन-सामग्री है। इसे महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के साहित्य-विभागों में अध्ययनार्थ सम्मिलित किया जाना चाहिए, जिससे राजस्थान के साहित्यिक इतिहास का संरक्षण संभव हो सके।

        जीएस पब्लिशर डिस्ट्रीब्यूटर्स द्वारा प्रकाशित इस 149 पृष्ठीय पुस्तक की छपाई स्वच्छ, जिल्द मजबूत तथा मुखपृष्ठ आकर्षक है। मुखपृष्ठ पर आकाश को छूने का स्वप्न देखने वाले बालकों की प्रतीकात्मक प्रस्तुति बालसाहित्य के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करती है।

        यद्यपि कहीं-कहीं वाक्य-रचना एवं सामान्य वर्तनी संबंधी त्रुटियाँ दृष्टिगोचर होती हैं, किंतु इतने विशाल कार्य में ऐसी त्रुटियाँ स्वाभाविक हैं। पाठक को इन छोटी-मोटी कमियों से अधिक कृति की मूल भावना और उसके साहित्यिक अवदान को महत्व देना चाहिए।

        डॉ. श्रीमती युगल सिंह को इस महत्त्वपूर्ण कृति के लिए हार्दिक बधाइयाँ। यह कृति निश्चित ही साहित्य-इतिहास में स्थायी स्थान प्राप्त करेगी। कृति-निर्माण में सहयोग देने वाले सभी व्यक्तियों का भी अभिनंदन।

        आदरणीया डॉ. श्रीमती युगल सिंह जी को साधुवाद कि उन्होंने यह अमूल्य कृति मुझे भेंटस्वरूप प्रदान की। साहित्य के विद्यार्थी के रूप में यह मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान धरोहर है और सदैव मेरे पुस्तकालय की शोभा बढ़ाती रहेगी।

        ईश्वर से प्रार्थना है कि वे निरंतर साहित्य-सेवा करती रहें तथा माँ सरस्वती का आशीर्वाद सदैव उन पर बना रहे।
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समीक्षक :
मच्छिंद्र बापू भिसे ‘मंजीत’
(एम. ए. बी. एड्. हिंदी-सेट, टेट, सीटेट)
अध्यापक – लेखक – संपादक

भिरडाचीवाडी, डाक भुईंज
तहसील वाई, जिला सातारा, महाराष्ट्र – 415515

संप्रति :
अध्यापक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर
तहसील सालेकसा, जिला गोंदिया, महाराष्ट्र – 441916

भ्रमणध्वनि : 9730491952
ईमेल : machhindra.3585@gmail.com

5 जून 2026, सुबह 9:25 बजे
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● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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■ सच्चाई का मोल ■ (बालकहानी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

 


■ सच्चाई का मोल ■

(बालकहानी)

       आज शमिता के छात्रवृत्ति परीक्षा के परिणाम घोषित हुए। पूरे विद्यालय में उत्साह का माहौल था। जुलूस निकाला गया, मिठाइयाँ बाँटी गईं और छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले छात्रों के सचित्र बैनर लगाए गए। तीस में से चौबिस छात्र उत्तीर्ण हुए और नौ छात्रों को छात्रवृत्ति मिली। शमिता ने जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। शिक्षा अधिकारी और अन्य मान्यवर विद्यालय आए और सभी सफल छात्रों का अभिनंदन किया। यह समाचार सुनकर शमिता के माता-पिता की खुशी का ठिकाना न रहा।

      शाम को जब शमिता घर लौटी, तो उसके चेहरे पर उदासी थी। माँ ने उसे पास बुलाकर प्यार से कहा, “बधाई हो, बेटा! तूने हमारा और विद्यालय का नाम रोशन किया। लेकिन तू इतनी उदास क्यों है? कुछ चाहिए तो बता।”

      यह सुनकर शमिता रोने लगी। माँ ने उसे सीने से लगाकर पूछा, “क्या हुआ, शमिता? तू रो क्यों रही है?”

      शमिता ने सिसकते हुए कहा, “माँ, क्या सच्चाई का कोई मोल नहीं होता? क्या झूठ ही जीतता है?”

      माँ यह सुनकर चौंक गई। उसने पूछा, “ऐसा क्यों कह रही है?”

      शमिता बोली, “मेरी कक्षा की रीना सबसे होशियार है, लेकिन उसे छात्रवृत्ति नहीं मिली। उसे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी… लेकिन…”

      माँ ने समझाते हुए कहा, “शायद उसने परीक्षा में अच्छे उत्तर नहीं लिखे होंगे। मेहनत करने वाले को ही फल मिलता है।”
      शमिता ने सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं माँ, ऐसा नहीं है। परीक्षा के दौरान एक व्यक्ति ने मुझे उत्तरों की सूची दी थी। मैंने वही देखकर सारे उत्तर लिख दिए। रीना ने यह सब देखा, लेकिन उसने उस कागज को उठाकर कूड़ेदान में फेंक दिया और मुझसे बात करना भी बंद कर दिया।”

      यह सुनकर माँ स्तब्ध रह गई। कुछ देर तक वह चुप रही, फिर गंभीर स्वर में बोली, “शमिता, तूने गलती की है। रीना भले ही छात्रवृत्ति न पा सकी हो, लेकिन वह सम्मान की अधिकारी है। अगर तूने उसी समय सच बता दिया होता, तो आज तुझे यह दुख नहीं होता।”

      माँ की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने आगे कहा, “याद रखना, बेटा—ऐसा कोई काम मत करना जिससे हम अपनी ही नज़रों में गिर जाएँ। गलत तरीके से मिली सफलता कभी सच्चा सुख नहीं देती। वह केवल बाहर से प्रतिष्ठा देती है, भीतर से नहीं।”

      शमिता ने माँ का हाथ अपने सिर पर रखते हुए कहा, “माँ, मुझे माफ़ कर दो। मैं आज से कभी गलत काम नहीं करूँगी और न ही गलत करने वालों का साथ दूँगी।”

      तभी दरवाजे पर खड़ी रीना अंदर आई। वह मुस्कुराते हुए बोली, “अरे, यहाँ क्या चल रहा है? मैं कब से बाहर खड़ी सब सुन रही थी।”

      उसके हाथ में फूलों का गुलदस्ता और एक सुनहरी कलम थी। उसने शमिता की ओर बढ़ाते हुए कहा, “बधाई हो, शमिता! यह मेरी तरफ़ से तुम्हारे लिए छोटा-सा तोहफा।” यह सुनकर शमिता फिर से रो पड़ी। रीना ने उसे संभाला।

      माँ ने रीना से कहा, “बेटी, शमिता को अपनी गलती का पछतावा है। मैं उसकी ओर से तुमसे माफ़ी माँगती हूँ। असल में छात्रवृत्ति की हकदार तो तुम हो।”

      रीना ने मुस्कुराकर कहा, “मौसी, मैं तो वह बात कब की भूल चुकी हूँ। शमिता मेरी अच्छी सहेली है, मैं उससे नाराज़ कैसे रह सकती हूँ? और हाँ, आप दोनों की सारी बातें मैंने सुन ली हैं—मुझे माफ़ कर दीजिए।” यह कहते हुए उसने कान पकड़ लिए।

      सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई। शमिता ने रीना को गले लगाते हुए कहा, “हम कभी ऐसा काम नहीं करेंगे, जिससे हम अपनी ही नज़रों में गिर जाएँ।”

      रीना ने सहमति में सिर हिलाया, “और उन लोगों से भी सावधान रहेंगे, जो खुद गिरकर दूसरों को भी गिरा देते हैं।”

      दोनों की बात सुनकर माँ के चेहरे पर संतोष की मुस्कान आ गई। घर का वातावरण फिर से खुशी से भर गया।
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29 अप्रैल 2026 रात: 09:45 बजे
रचनाकार: मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' 



रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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■ चला हो जाऊया शाळेत ■ (मराठी कविता)

■ चला हो जाऊया शाळेत ■

(कविता)

चला हो जाऊया शाळेत, शाळेत,
आनंद फुलू दे गालात,
शाळेची पोरं माझ्या हातात, हातात,
नाव कमावतील देशात!

अक्षरं काढतील अंक गिरवतील
रंगही भरतील, चित्रही काढतील
उभारी देऊ त्यांच्या हातात, हातात,
नाव कमावतील देशात!

खेळांत रमतील गाणीही म्हणतील
थोडंसं हसतील थोडंसं रडतील
भात-भाजी देऊ त्यांच्या ताटात, ताटात
नाव कमावतील देशात!

ज्ञानही घेतील सर्वांना वाटतील
कष्टही करतील स्वप्नं सजवतील
स्वप्न उतरवतील सत्यात, सत्यात
नाव कमावतील देशात!

शाळा ही आमची किती सुंदर घर
मुले ही गोड प्रेम करतात फार
संस्कार घडवू त्यांच्या मनात, मनात,
नाव कमावतील मग जगतात!

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06 ऑक्टोबर 2025 सकाळी: 07.58 वाजता
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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■ समीक्षा: कृति - ‘हाड़ौती अंचल का बालसाहित्य : उद्भव एवं विकास’, लेखिका : डॉ. श्रीमती युगल ■ समीक्षक : मच्छिंद्र बापू भिसे ‘मंजीत’

■ कृति समीक्षा ■ कृति : ‘हाड़ौती अंचल का बालसाहित्य : उद्भव एवं विकास’ लेखिका : डॉ. श्रीमती युगल सिंह समीक्षक : मच्छिंद्र बापू भिसे ‘मंजीत’ ...

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