मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

वतन-ए-फ़र्ज

🌹वतन-ए-फ़र्ज🌹

साथ हम भी चलें साथ तुम भी चलो,
हिंद के सपूत हो वतन-ए-फ़र्ज निभाते चलो,
कर्ज इस धरा के चुकाने हैं हम सब को आज,
कदम से कदम दिल से दिल मिलाकर चलो.

खिलते रहे गुल-ए-गुलशन में हर पल,
खुशबू हर प्यार की हर एक साँस में भरो,
रहे आब़ाद जश्न और फ़िजा के रंग आज,
हर साँस, नस-नस में विश्वास पिरोते चलो.

चाह दिल में रहे हम सभी जन एक हो,
मिटा न सके कोई हम सभी जान एक हो,
सूरतें चाहे हो हजार-ए-इन्सान आज,
भारत-भारती के दिल की धड़कन बनाते चलो.

मिटे भरम मजहबी सब मजहब एक हो,
'जन-गण-मन' गान हर दिलप्रीत एक हो,
भारत जननी के रखवाले हम सब आज,
निज खून धरा के लिए उर्वरक डालते चलो.

रचनाकार,
मच्छिंद्र भिसे,
भुईंज, सातारा (महाराष्ट्र)
9730491952 / 9545840063
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२६ जनवरी २०१९

नववर्ष के स्वागत में (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

नववर्ष के स्वागत में

हर साल की तरह,
मुस्कराता रंगीन चेहरा लेकर,
नववर्ष का पहला पन्ना,
फिर से आया है,
मेरे जीवन के,
कितने ही सुनहरे पलों को,
भूतकाल में समेटने, वर्तमान बनकर,
क्या नववर्ष फिर से आया है?

बचपन से आज तक,
नववर्ष के पन्ने बदलता रहा,  
पन्नो के बीच उम्मीदों के,
खोए दिनों को तलाशता रहा,
क्या पाया? क्या खोया?
हिसाब फिर भी न कर पाया मैं,
जायजा लेकर मन को आहत करने,
क्या नववर्ष फिर से आया है?

पन्नों के रंगीन टुकड़े,
टुकड़ों में बिखरते सपनों की,
याद जो दिलाते हैं,
जो कभी पिछले साल देखे थे,
आपाधापी में आगे जो बढ़े हैं,
कैलेंडर के मुखपृष्ठ पर दिखलाते हैं,
उन सपनों को दिखाकर,
क्या नववर्ष मेरा विश्वास तोड़ने आया है ?

ऐ नववर्ष ! कितना भी कर ले हर्ष,
खोई उम्मीद को कभी,
भूतकाल में न खोजा मैंने,
सुनहरे जीवन के सपने और पलों को,
मिटने न दिया मन-मस्तिष्क से मैंने,
पर तू बता हे नववर्ष !
मैं तो वहीँ का वही हूँ,
क्या खुद को मिटाने,
क्या अपनी नाक कटाने फिर से आया है?


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नवकवि
 मच्छिंद्र भिसे (उपशिक्षक)
सदस्य, हिंदी अध्यापक मंडल सातारा
भिरडाचीवाडी, पो.भुईंज, तह.वाई,
जिला-सातारा 415  515  (महाराष्ट्र )
संपर्क सूत्र  ; 9730491952 / 9545840063 

२६/११ की अनहोनी

२६/११ की अनहोनी
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           आज से १० वर्ष पूर्व मुंबई में हुए हमले की याद आते ही मन दहल जाता है। मैं सायन के एक ऑफिस में काम पर था। यकायक शाम ४ बजे के आस-पास खबरें आने लगी कि सीएसटी पर हमला हुआ है। ट्रैन, बस सेवा बंद हो गई। तीन दिन मुंबई सहीत पूरा देश भयाक्रांत था परंतु महाराष्ट्र पुलिस और कमांडो फोर्स ने अपनी बहादुरी दिखाते हुए कड़ा मुकाबला किया। परंतु दुर्भाग्य से मातृभूमि के लिए पुलिस अधिकारियों सहीत १८ सूरमा शहीद हुए, जिसमें मेरे गाँव के शहीद बापूराव साहेबराव धुरगुडे (पीएसआय) भी शहीद हुए।
        सभी ने अपने देश के लिए शहीदी दी। सभी शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजली।
        इस घटना के शहीद वीरों को शब्दांजली...
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२६/११ पल दो पल में......
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आते देख आज की तारीख ताज भी सहम गया,
याद कर उस शहीदी को फूट-फूटकर वह रोया,
लहूलुहान थी धरा वक्त भी संभल नहीं पाया,
यमालय से भयभीत यम भी डरते-डरते आया,
वीर सपूतों को भारत भू ने पल दो पल में खोया।

२६/११ की खुशहाल शाम दहलने लगी,
छत्रपती टर्मिनल पर गोलियाँ सूँ-सूँ चलने लगी,
मुंम्बापुरी आंतकी भय से अंतस्थ धधकने लगी,
यकायक शहर पर डर का बिछ गया था साया,
वीर सपूतों को भारत भू ने पल दो पल में खोया।

वीरों को भनक लगी, निकले लेकर जान हथेली,
बाँध कफन सिर पर, न ले सके अपनों की बिदाई,
बस एक ही अरमान था, हो देश की रखवाली,
सामने बस थी मातम और आतंक की छाया,
वीर सपूतों को भारत भू ने पल दो पल में खोया।

गोलियाँ चली घनेरी दोनों ओर से बारी-बारी,
आतंकी असुरों के मौत की हो गई तैयारी,
बढ़ गए देश के सूरमा आगेे, लेकर एक चिंगारी,
पता नहीं था उन्हें मिलेगा, देखने शांति का साया,
वीर सपूतों को भारत भू ने पल दो पल में खोया।

घमासान हुँकार साँस रूकाए देख रही थी धरा,
आतंक मिटाते-मिटाते एक-एक सूरमा जब गिरा,
धरा-अंबर की थर्राई रूह, लगा मिटेगा जग सारा,
खत्म हुआ अातंक, आतंकी जो जाल बुनाया,
वीर सपूतों को भारत भू ने पल दो पल में खोया।

हे मातृभूमि, तेरे लिए सौ-सौ बार जनम हम लेंगे,
फिर सपूत बनकर तुझपर बलि-बलि जाएँगे,
कहते है शहीद आज, मत रो मेरे प्यारे ताज,
तेरे कारण ही तो दुनिया का प्यार है हमने पाया,
मत रो भारतमाता प्यारे शहीदों ने समझाया।

वीर सपूतों को भारत भू ने पल दो पल में खोया।
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शब्दांकन-रचना
श्री. मच्छिंद्र भिसे,
अध्यापक
ग्राम भिरडाचीवाडी,
पोस्ट भुईंज, तहसील वाई,
जिला सातारा ४१५ ५१५ (महाराष्ट्र)
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■ कोंकण की सैर■ (बाल कहानी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

कोंकण की सैर (कहानी रविवार की सुबह थी। आसमान में हल्के बादल छाए हुए थे। घर के आँगन में आम के पेड़ के नीचे दादा जी आराम से बैठे अखबार पढ़ रहे...

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