
■ आगे देखो ■
(लघुकथा)
लोकल ट्रेन में चढ़ते ही वह युवक अपने लिए बैठने की जगह ढूँढ़ने लगा। ट्रेन में जहाँ तीन व्यक्तियों के बैठने वाली सीटें थीं, वहाँ कहीं तीन तो कहीं केवल दो यात्री बैठे थे। किसी ने अपना सामान सीट पर रख छोड़ा था, तो कोई अपने पैर फैलाकर आराम से बैठा था, मानो पूरी सीट उसी की हो। सीटों के ऊपर सामान रखने की जगह भी थी; कहीं वह खाली थी तो कहीं सामान से भरी हुई। युवक ने पूरे डिब्बे पर सरसरी नज़र दौड़ाई। बीच की गैलरी में भी अनेक यात्री ऊपर लगे हैंडल पकड़कर ट्रेन के साथ हिलते-डुलते सफ़र कर रहे थे।
कुछ देर बाद युवक एक ऐसी सीट के पास पहुँचा, जहाँ केवल दो व्यक्ति बैठे थे। उसने विनम्रता से कहा,
"भैया, बैठने के लिए थोड़ी-सी जगह बना दीजिए।"
उनमें से एक आराम से बैठे व्यक्ति ने बिना उसकी ओर देखे कहा, "आगे देखो, बहुत जगह खाली है।"
युवक ने फिर गैलरी में खड़े यात्रियों की ओर देखा और शांत स्वर में बोला, "भैया, आगे कहीं जगह नहीं है। आप दोनों बैठे हैं, मुझे भी अपने साथ बैठा लीजिए। यहाँ तो तीन लोग आराम से बैठ सकते हैं।"
उस व्यक्ति ने युवक को घूरते हुए कहा, "जा, आगे देख!" युवक हल्की मुस्कान के साथ आगे बढ़ गया।
थोड़ी दूर दूसरी सीट पर पति-पत्नी बैठे थे। दोनों के बीच सीट पर उनका सामान रखा था। युवक को लगा कि एक घंटे के सफ़र के लिए यहाँ तो जगह बन ही जाएगी। उसने विनम्रता से पूछा, "चाचा जी, यदि आप अनुमति दें तो मैं आपका सामान ऊपर रख दूँ, ताकि मुझे बैठने के लिए थोड़ी जगह मिल जाए।"
इतना सुनते ही उस व्यक्ति की पत्नी ने अपने सामान पर ऐसे हाथ रख दिया, मानो वह वहाँ से एक इंच भी नहीं हटेगा। युवक फिर मुस्कुरा दिया। उसकी मुस्कान देखकर उस व्यक्ति ने कहा, "आगे देखो, दूसरी बर्थ पूरी खाली है।"
युवक ने एक बार फिर गैलरी में लटके खड़े यात्रियों की ओर देखा और मन ही मन सोचा— सचमुच जगह तो बहुत खाली है... पर इन लोगों के दिल ही खाली हैं। वह बिना कुछ कहे खड़े यात्रियों के साथ हैंडल पकड़कर खड़ा हो गया।
इसी बीच भीड़ में से एक आत्मीय आवाज़ आई— "बेटा, इधर आ जाओ... यहाँ बैठ जाओ।"
युवक ने आवाज़ की दिशा में देखा। यह उसी सीट के पास बैठे एक बुज़ुर्ग की आवाज़ थी, जिसके बगल में पहले वाले यात्री बैठे थे। नज़रें मिलते ही बुज़ुर्ग ने फिर स्नेह से कहा, "आ जाओ बेटा, हमारी सीट पर बैठ जाओ। जगह बन जाएगी।"
यह कहकर उन्होंने अपने नौ-दस वर्ष के पोते को गोद में बिठा लिया। सीट पर थोड़ी-सी जगह बन गई थी, लेकिन उस क्षण बुज़ुर्ग ने युवक के दिल में बहुत बड़ी जगह बना ली थी।
युवक बैठ गया। बुज़ुर्ग मुस्कुराए और बोले, "बेटा, यह सफ़र तो कुछ मिनटों या घंटों का है। यह जगह कौन अपने साथ ले जाएगा? छोड़ो भी! आगे चलकर मैं भी मर जाऊँगा, तुम भी एक दिन बूढ़े हो जाओगे और इस दुनिया से चले जाओगे। यहाँ कोई हमेशा रहने वाला नहीं है। इसलिए आराम से बैठो।"
बुज़ुर्ग की यह बात उस बर्थ में बैठे लगभग सभी लोगों ने सुनी। उन लोगों ने भी, जिन्होंने युवक से कहा था— 'आगे देखो।'
अनायास युवक ने उनकी ओर देखा। वे सब नज़रें चुरा रहे थे। शायद उन्होंने भी दादा जी की तरह 'आगे' देख लिया होता, तो वे भी किसी के दिल में जगह बना पाते।
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रचनाकार:
मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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