मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

आजादी का झंडा (लघुकथा) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'


आजादी का झंडा
(लघुकथा)
             पंद्रह साल का भोलू चौदह साल की मुफ्त शिक्षा के बाद अगली पढ़ाई हेतु सुबह-शाम छोटे-छोटे काम किया करता था। सुबह अखबार बाँटना तो कभी शाम के वक्त स्टेशन पर छोले-भटूरे बेचना। 
             आज स्वाधिनता दिवस की खुशी में सड़क के किनारे फूटपाथ पर सुबह झंडे बेच रहा था। बच्चे-बूढ़े आकर भोलू से झंडे लेकर जाते थे। 
             कुछ समय बाद सब झंडे बिक गए, सिवाए एक छोटे झंडे और झंडे रखने की टोकरी के। वह उस झंडे को टोकरी पर गाड़े, टोकरी को सिर पर उठाए जा ही रहा था कि यकायक एक आलिशान गाड़ी आकर उसके पास रूक गई। 
             उसमें से उतरकर एक सफेद टोपी और पोशाक पहने आदमी ने आकर कहा- "ऐ छोरे! झंडा कैसे दिया?"
             "साहब जी, यह झंडा बिकाऊ नहीं है।" -भोलू ने 'ना' के स्वर में कहा। 
             "मैं तुम्हें इसकी दूगनी कीमत दूँगा, जल्दी कर मुझे नगर परिषद के मैदान पर झंडा फहराने जाना है।" -साहब ने जेब में हाथ डालते हुए कहा।
             भोलू ने कहा- "माँ ने कहा कि सब झंडे बिकने पर आखिरी झंडा वापस ले आना।"
             "अच्छा! फिर मैं तिगुना दाम देता हूँ। माँ से कहना कि इस नगर के सफेद पोशाकवाले मेयर ने आखिरी झंडा खरीद लिया।"
             यह सुनकर भोलू ने टोकरी में गड़े झंडे को निकालकर अपनी फटी कमीज़ में छिपाया और निड़र होकर कहा- "अब तो मैं यह झंडा बिल्कुल नहीं दूँगा। माँ ने यह भी कहा कि कोई गरीब आए तो उसे झंडा मुफ्त में देना लेकिन कोई तुझे उसके अधिक दाम दे, तो उसे कतई मत‌ देना क्योंकि यह ऐसे लोग हैं जो आजादी का झंडा दुगनी कीमत में लेंगे और चौगुनी कीमत लेकर अपने ही झंडे के साथ देश को भी बेच देंगे।" 
             भोलू की बात सुनकर मेयर झल्लाते हुए चले गए।
             उसी समय नजदीक बाँकड़े पर बैठे रिटायर मेजर यह सब देख रहे थे। उन्होंने भोलू के पास आकर झंडा फिर से टोकरी में गाड़ते हुए कहा- "शाबाश मेरे शेर! सही मायने में तुम ही आजादी का जश्न मना रहे हो बाकि के तो बस दिन मना रहे हैं।"
             उस अनजान बूढ़े की बात भोलू के पल्ले नहीं पड़ी। भोलू शाबासी की खुशी में 'नन्हा मुन्ना राही हूँ' गुनगुनाते हुए जा रहा था। रिटायर मेजर भोलू में आजादी के बाद का सुभाष बाबू देख रहे थे।
-०-
19 अगस्त 2021, पूर्व रात्रि 12:23
रचनाकार: मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' ©® संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका,  सातारा (महाराष्ट्र)
मोबाइल: 9730491952

संपर्क पता
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'  
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका
भिरडाचीवाडी, डाक- भुईंज,  
तहसील- वाई, जिला- सातारा महाराष्ट्र
पिन- 415 515
मोबाइल: 9730491952
ईमेल: machhindra.3585@gmail.com
-0-

सबसे सुंदर मेरा वतन (बालकविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

  

सबसे सुंदर मेरा वतन 
(बालकविता)
अपनी धरती की माटी पर
चलते जाते शान से,
सबसे सुंदर मेरा वतन
प्यारा दिलों-जान से।

नदियाँ बहती गीत है गाती
सुधा बहाती मान से,
लहरें खेती मन को भाती
इतराती अभिमान से।

हिमालय के आँगन में गूँजे
गीत गीता-कुरान से,
धर्म देश है जाति मानव
बंधुता पलती इक प्राण से।

मीठा खाते पर्व मनाते 
रंगते होली गुलाल से,
ईद मनाते दीप जलाते
सद्भावना सम्मान से।

कितनी सुंदर मधुर बोलियाँ
राष्ट्रगीत गाए एक तान से,
रहे तिरंगा ऊँचा जगत में
बोलो वंदे मातरम् जी-जान से।
-0-
मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' ©®
(अध्यापक-कवि-संपादक)
सातारा (महाराष्ट्र) पिन- 415 515
मोबाइल: 9730491952
ईमेल: machhindra.3585@gmail.com
-०-
09 अगस्त 2021
पूर्व रात्रि 1.10

गुरूशब्द मोती जैसे (दोहे- मुक्तछंद) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

 

गुरूशब्द मोती जैसे 
(दोहे - मुक्तछंद)
गुरू के बिन जीवन खाली, जैसे बंजर जमीन।
सही ज्ञान के निशान कहाँ, जग में सबसे दीन।।

गुरू राह देखता-दिखाता, नव अंकुर के आन।
भटके कोई फटके उसको, छिड़कता उनपर जान।।

अंधा बन बैठ गया, गुरू को न अपनाय।
औरन् ले खुद भी डूबा, फिर-फिर गोता खाए।।

बरगद-सा गुरू बना, हम बन जाए शाख।
कितने ही पत्ते झरते जाए, झूके न उनकी आँख।।

गुरूज्ञान से बना अमीर, गुरू ही सबसे अमीर।
धन-दौलत क्या तूने पाई, गुरू बिन सबै फकीर।।

गुरू का न जाति-धरम, बनाए सबको संज्ञानी।
धरम की बात जो भी करै, सदा रहा मूर्ख-अज्ञानी।

गुरूशब्द मोती जैसे, गलहार बना पहन।
शब्द छूटा; जनम मिटा, सब हो जाएगा दहन।।

गुरू से लेकर ज्ञान को, ज्ञानी हम सब बन जाए।
गुरू तो गुरू ही रहता, चाहे सब आसमान भी पाए।।

गुरू न कोई छोटा-बड़ा, ज्ञान जित मिलें उत पाए।
सम्मान सबका करते रहना, 'मैं' का साया न छू जाए।।

गुरू वंदन वारंवार करें, सिर न झूकता जाए।
जो सिर गुरू झूका 'मंजीतें', अपने को राख में पाए।।
-0-
२३ जुलाई २०२१
मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' ©®
(अध्यापक-कवि-संपादक)
सातारा (महाराष्ट्र) पिन- 415 515
मोबाइल: 9730491952
ईमेल: machhindra.3585@gmail.com
-०-

■ कोंकण की सैर■ (बाल कहानी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

कोंकण की सैर (कहानी रविवार की सुबह थी। आसमान में हल्के बादल छाए हुए थे। घर के आँगन में आम के पेड़ के नीचे दादा जी आराम से बैठे अखबार पढ़ रहे...

आपकी भेट संख्या