मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

हलधारी जवान

हलधारी  जवान

प्रतिपाल सारे जहान का,
हलधारी वह जवान है,
पनाह में आबाद जिसके,
वतन-ए-हिंदुस्थान है.

आसमान की छाँह में,
धूप-घनेरी बरसात में,
सिंचाई करें निज खून से,
फिर भी चेहरे मुस्कान है.

महँगाई की मार है,
घर-चूल्हा कंगाल है,
बेतरतीब मौसम से,
जीवन उसका तूफान है.

अकाल की चाल ने,
घर, बीमारी सवाल ने,
लुटेरे समय के तैश में,
खेती जिसकी जान है.

मौसम दुश्मनों के दल हैं,
सपनों के टूटे महल हैं
परिवार संग जीने की पहल से,
हर दिन नया विहान है.

देखा समय का इतराना,
सौ बार सहा शासन का ताना,
काल ने किए अनचाहे वार हैं,
सीना ताने देखो किसान है.
-0-
५ मार्च २०१९
रचनाकार
मच्छिंद्र भिसे (अध्यापक)
सदस्यहिंदी अध्यापक मंडल सातारा
भिरडाचीवाडीपो.भुईंजतह.वाई,
जिला-सातारा 415  515  (महाराष्ट्र )
संपर्क सूत्र  ; 9730491952 / 9545840063 
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नेपथ्य से (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

नेपथ्य से
(कविता)
जीवन नहीं सजा करता है
बिना कँटीलें-बीहड़ पथ से,
राग-अनुराग यूँ ही नहीं छिड़ा करता,
बगैर हौसले और नेक इरादे नेपथ्य से.

जनम मिला खुशी पाईं औरों ने,
खुद से लड़ना है कही बात गैरों ने,
हाँ! हाँ! खुशियाँ यूँ ही मुफ़्त नहीं मिलती,
बगैर खुद जिंदादिली शिकस्त खाने से.

जीवन पथ सच्चाई का लगा कठिन बड़ा,
चारों ओर से नौंचता तूफ़ान होता रहा खड़ा,
उफ़! समझा मंजिल यूँ ही सहज नहीं मिलतीं,
बगैर कड़ा परिश्रम-पसीना बहाने से.

मन में भर विश्वास और चाल हो नेक,
चल पड़े गर्द झाड़े मिलेगी मंजिल देख,
अरे! प्यार जमाने से यूँ ही नहीं मिलता,
बगैर बेवफाई के साथ वफाई से.

सच कहूँ मेरे प्यारों, जीवन अपना अकेला,
खुद ही उभरा या दिया कहीं धकेला,
प्यासे मन की तृष्णा यूँ ही नहीं मिट पाती,
बगैर औरों की तृष्णा मिटाने से,
और.........
उम्र नहीं ढलती कभी अनुजों को अग्रज बनाने से.
-0-
(१५ मार्च २०१९)
रचनाकार
मच्छिंद्र भिसे (अध्यापक)
सदस्यहिंदी अध्यापक मंडल सातारा
भिरडाचीवाडीपो.भुईंज, तह.वाई,
जिला-सातारा 415  515  (महाराष्ट्र )
संपर्क सूत्र  ; 9730491952 / 9545840063 
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सजता एक मकान (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

सजता एक मकान
 मीठी-मीठी प्यार की बोली,
और नेकी जिसकी जान,
हर गली, हर चौराहे पर उसका,
सजता एक मकान.

न कोई दौलत न कोई शौहरत,
न कोई चाहत न कोई हसरत,
दिल बड़ा और बड़प्पन से
भरता निज जीवन में शान,
हर गली, हर चौराहे पर उसका,
सजता एक मकान.

प्यार बाँटता प्यार ही पाता,
सबसे बुनता दिल का नाता,
डंख शब्द-जहर मिलते फिर भी,
चेहरे खिलती सुधा-सी मुस्कान,
हर गली, हर चौराहे पर उसका,
सजता एक मकान.

मधुर वाणी से घट भर प्यारे,
जीवन में होगा फिर-फिर विहान,
न होगा कोई अपना-पराया,
भला कहलाएगा हर इन्सान,
देखो ! हर गली, हर चौराहे पर,
मानवता की सजने लगी दूकान.
                          (१९ मार्च २०१९)
रचनाकार
मच्छिंद्र भिसे (उपशिक्षक)
सदस्य, हिंदी अध्यापक मंडल सातारा
भिरडाचीवाडी, पो.भुईंज, तह.वाई,
जिला-सातारा 415  515  (महाराष्ट्र )
संपर्क सूत्र  ; 9730491952 / 9545840063 
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■ कोंकण की सैर■ (बाल कहानी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

कोंकण की सैर (कहानी रविवार की सुबह थी। आसमान में हल्के बादल छाए हुए थे। घर के आँगन में आम के पेड़ के नीचे दादा जी आराम से बैठे अखबार पढ़ रहे...

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