
■ रावण ■
(कविता)
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(कविता)
इस साल भी रावण का
दहन हो ही गया;
रावण मरता ही नहीं
फिर से पता चल ही गया;
अगले साल फिर रावण
को लाया जाएगा;
मरता रहेगा हर साल वो
फिर से पैदा होता जाएगा।
परंतु;
दो रावणों के बीच में
कितनी ही कहीं कईं -
सीताएँ लूटी
लूटी माताएँ
बालिकाएँ लूटी
लूटी कोक कलिकाएँ;
और लूटा
किसीने अपनों को
किन्हीं के सपनों को
कभी आत्मविश्वास को
कभी विश्वास से श्वास को;
यह सिलसिला चलता रहा
हर कोई यहाँ लूटता रहा;
कभी महँगाई की मार से
बेरोजगारी की तलवार से
गरीबी और भूखमार से
कभी अमीरों के डकार से;
लूटी गई नौकरियाँ
छीनी गई टोकरियाँ
छीनी गई बोलियाँ
लूटी गई बालियाँ;
लूटता रहा देश
पहने सफेद भेष!
वो रावण फिर भी
असली रुप में आया था
मैं हूँ रावण, कहलाया था;
इनकी असलियत दिखाते हैं
ईडी से हमको धमकाते हैं!
अब तो लोकतंत्र ही लूट गया
पता नहीं कहाँ छूट गया;
लूटम-लूट चल रही है
रावणी टोली उठ रही है।
घर-गली से शहर तक
गाँव से दिल्ली तक
रावण लूटाई जोरों पर है;
गिनते रहोगे कबतक
वे हजारों-करोडों पर हैं।
क्या इनका दहन
कभी कोई कर पाएगा?
क्या मंदिर बनाने से
वो राम और रामराज्य
फिर से आएगा?
अब.....
अपने अंदर के ही
राम को जगाना होगा
खुद बनकर राम ही
हर रावण को मिटाना होगा;
लूटम-लूट जब थम जाएगी
भारतमाता सच्चा दशहरा
तब एक बार ही मनाएगी।
नहीं तो हर साल
रावण के पुतले जलते रहेंगे
उसकी हर चिंगारी से
हर दिन रावण पैदा होते जाएँगे
रावण मर गया, रावण मर गया
इस खुशी में खुदखुशी करते
खुशी-खुशी
हम दीप दिवाली मनाएँगे...
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21 अक्तूबर 2026 शाम 7:30 बजे
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952

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