
■ अदबी लफ़्जों ने ■
(गजल)
अदबी लफ़्ज़ों ने किरदार बनना छोड़ दिया है।
जबसे लोगों ने असरदार बनना छोड़ दिया है।
लिखते-बोलते गए, करते गए अपनी इबादत,
औरों ने जबसे अपना बनाना छोड़ दिया है।
बहा दिया है हमने ख़ुद को पाक सलिला में,
जबसे इस दिल का आशियाना छोड़ दिया है।
कभी-कभी हवा से उतर आते हैं अंगूरी लता से,
ग़ज़ल में भरकर भरपूर पीने को छोड़ दिया है।
जो मेरे मीत बने, सदा संगी बने अकेली रातों के,
'मंजीते' जोड़ता रहा उन्हें, जो वक़्त ने छोड़ दिया है।
-०-
16 जनवरी 2026 शाम: 09.10 बजे

इंदौर समाचार पत्र में 22 जुलाई 2026 को प्रकाशित
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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