मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

■ तो आ जा ■ (कविता)

■ तो आ जा ■
(कविता)

तू आगे मैं पीछे
मैं पीछे ही चल रहा
पीछा करते हुए;
तू आगे बढ़ती रही
मैं भी तेरे पीछे बढ़ता रहा
पर तू तो मिली न रही।
एक रोज मिलेगी
मेरे पल्ले पड़ेगी
इस ताक में पीछे चलता रहा
अपने आपको ढोता रहा;
पर तेरे पीछे चलते-चलते
मैं इतना पीछे बढ़ गया
अब मेरे पीछे कुछ नहीं
परछाई को भी रहा न गया।
अब तुम ही पलटकर
पीछे देखो.......जिंदगी 
कि तेरे पीछे भी है कोई ?
या तू भी है अकेली
ठगी किसी से दुकेली।
तो आ जा
मिलते हैं और
और मिलाते हैं - 
अकेेले-दुखेले को
पहुँचाते है सही गंतव्य;
जो सिर्फ चलते रहे
किसी के पीछे नहीं
फिर भी गिरते हैं
अकेले में ।
-०-
24 अगस्त 2025 सुबह: 12.00 बजे
रेल यात्रा के दौरान - अकेले सफर करते हुए हम सभी तो यही करते हैं । बस पीछा और पीछा, पर पता नहीं किसका, जवाब नहीं मिल पाता है।
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-


■ छपक-छपाक ■ (बालगीत) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत

■ छपक-छपाक ■
(बालगीत)
रिमझिम बारिश आती है,
आँगन हमारा भिगोती है।

कीचड़ मुझको भाता है,
कपड़ों को ही रँगाता है।

छपक-छपाक कूद जाती हूँ,
कीचड़-पानी सब उड़ाती हूँ।

संगी सब जब आती हैं,
बूँदों जी भर भीगोती हैं।

बारीश तभी तू आना जी,
जब मम्मी घर न होती है।

जी करता और खेलूँ-कुदूँ,
मम्मी जोर-जोर से चिल्लाती है।
-०-
19 मई 2025 सुबह: 08:33 बजे
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-


■ जीवन ही खेल ■ (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

■ जीवन ही खेल ■
(कविता)
हार मिली तो रोते हो जी,
व्यर्थ समय क्यों खोते हो जी;
कभी तो जीत मिलेगी तुमको,
तुम वीर-धीर, जंग-ए-खिलाड़ी हो
बस! जी-जान खेलो जी।

सूरज भी ढलता हर शाम को,
फिर से उगता है नई भोर को;
अंधेरे से लड़े, उजाला लाए,
जीवन भी बस ऐसा सिखाए जी।

सपनों को पंख दो, उड़ान दो,
हर ठोकर से भी कुछ सीख लो;
जहाँ राह कठिन, वहाँ मंज़िल पास,
हौसलों के संग सब आसान है जी।

हार-जीत तो बस बहाने हैं,
जीवन के ये अनमोल ख़ज़ाने हैं;
बस चलते रहे, थम न जाए क़दम,
हर कोशिश देगा ऊँचाई का धरम जी।

लो उठो, बढ़ो, मुस्कुराओ जी,
हरपल उत्सव मनाओ जी;
खेल ही जीवन, जीवन ही खेल,
दिल को विजेता हो समझाओ जी।
-०-
27 मार्च 2025 शाम: 07:00 बजे
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-


■ कोंकण की सैर■ (बाल कहानी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

कोंकण की सैर (कहानी रविवार की सुबह थी। आसमान में हल्के बादल छाए हुए थे। घर के आँगन में आम के पेड़ के नीचे दादा जी आराम से बैठे अखबार पढ़ रहे...

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