.png)
■ तो आ जा ■
(कविता)
तू आगे मैं पीछे
मैं पीछे ही चल रहा
पीछा करते हुए;
तू आगे बढ़ती रही
मैं भी तेरे पीछे बढ़ता रहा
पर तू तो मिली न रही।
एक रोज मिलेगी
मेरे पल्ले पड़ेगी
इस ताक में पीछे चलता रहा
अपने आपको ढोता रहा;
पर तेरे पीछे चलते-चलते
मैं इतना पीछे बढ़ गया
अब मेरे पीछे कुछ नहीं
परछाई को भी रहा न गया।
अब तुम ही पलटकर
पीछे देखो.......जिंदगी
कि तेरे पीछे भी है कोई ?
या तू भी है अकेली
ठगी किसी से दुकेली।
तो आ जा
मिलते हैं और
और मिलाते हैं -
अकेेले-दुखेले को
पहुँचाते है सही गंतव्य;
जो सिर्फ चलते रहे
किसी के पीछे नहीं
फिर भी गिरते हैं
अकेले में ।
-०-
24 अगस्त 2025 सुबह: 12.00 बजे
रेल यात्रा के दौरान - अकेले सफर करते हुए हम सभी तो यही करते हैं । बस पीछा और पीछा, पर पता नहीं किसका, जवाब नहीं मिल पाता है।
रचनाकार
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
-०-

No comments:
Post a Comment