मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

बसंत ऋतु: हर्ष की नवचेतन बहार (आलोक) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

 

●बसंत ऋतु: हर्ष की नवचेतन बहार● 

(आलेख)

     अपने निरामय जीवन में आनंद फैलाने की जब-जब बात उठती है, प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत की पंक्तियाँ याद आती है कि –
         जड़ जग इतना सुंदर जब
         चेतन जग में क्या कारण
          रहता अहरह जो
          विषण्ण जीवन मन का संघर्षण?
     हमारे प्राकृतिक जगत में सौंदर्य आनंद की इतना वैभव भरा है कि उसे अपनी आँखों से ही चुराया जा सकता है लेकिन बताया या दिखाया नहीं जा सकता; बस उसे महसूस किया जा सकता है। भारतवर्ष की प्राकृतिक आबोहवा को संसार के ब्रह्मा ने अपार स्नेह और असीम अलौकिकता से विविधता के साथ गौरवान्वित किया है। इन्हीं में एक गौरव पुष्प है हमारी ऋतुएँ! छह ऋतुओं का अपना-अपना परिवार मानो अपनी अनूठी छवि लिए जगत को कहते हैं-
         आओ न कभी आँगन में हमारे
         अपने आँगन-द्वार लाँघकर
         चित पावन हो जाएगा यहाँ
         क्या रखा है चारदीवारी के अंदर!
     प्रकृति की सर्वोच्च आनंद प्रदायिनी ऋतु ऋतुराज बसंत के बसंती दिनों में प्रकृति का अद्भुत दर्शन तो देखने से ऐसा लगता है कि थकान से आए बुढ़ापे में जवानी फिर से उमड़ पड़ी है। बसंत ऋतु प्रकृति के पुनरुज्जीवन का प्रतिक है। बसंत ऋतु के आने पर उसकी उम्र बढ़ती जाती है; इसी हेतु बसंत ऋतु सभी ऋतुओं में अपने अनूठे प्राकृतिक श्रृंगार के कारण विशेष है। वह प्राकृतिक अंतस्थ समाधान देने वाला ऋतुराज बसंत दानी-सा प्रतीत होता है।
     हाड़ काँपती ठंड और चिलपिलाती गर्मी के मध्य बसंत ऋतु का आगमन ठंडर्मी की अनुभूति कराने वाला होता है। मध्य फागुन से शुरू होने वाला बसंतोत्सव वैशाख माह तक चलता है। यह ऋतु विशेषकर प्राकृतिक, सामाजिक, अध्यात्मिक, सृजनात्मक एवं शैक्षिक महात्म्य है।
     ठंड के कारण शीत लहर की रजाई ओढ़े सिकुड़ी प्रकृति धीरे-धीरे अंगड़ाई लिए, नए रूप में प्रकट होती है; मानो लार्वा से तितली तक-सी सुंदर सुखद यात्रा हो। शीत में पतझड़ से नीरस बनें पेड़ बसंत के आगमन से नई-नई फुनगियों को लाकर मानों कोंपल रूपी दीये जलाकर बसंत के आगमन का अभिनंदन करते हैं। धीरे-धीरे पेड़ हरे बन जाते हैं और बसंत ऋतु वनराई में मरकत से प्राकृतिक जीवंतता को दर्शाता है।
     आम्र वृक्ष हराभरा हो जाता है। उसपर पीली बासंती बौर आते ही आम्रबाग महकने लगता है। उस आम्रबौर की पहली महक मन में वो सुकून पैदा करती हैं जो दीर्घ तपती मिट्टी पर गिरने वाली बरसाती पहली बूँदे सौंधी सुगंध की तरह महसूस होती है। पूरा जीव-जगत आम्रबौर की महक को अतंस्थ संजोए रखता है पुरे साल भर के लिए। फिर उसपर लगी कच्ची अंबिया को चखना अपने आप में अद्भुत आनंद यात्रा होती है। इन्हीं दिनों आम्र संसार से कोयल बसंत गीत गाता सुनाई पड़ता है, तो कहीं मयुरराज आम के बागान में बसंती हवा का आनंद लेते घुमते दिखाई देते हैं।
     बसंत में कई पेड़ पौधों पर फूलों की बसंत बहार ऐसे खिल उठती है मानों बीते बसंत के बाद इसी इंतज़ार में थी कि कब इस ऋतुराज का आगमन होता है। इंद्रधनू रंग के बसंती फूल अपने रंगीन और खिली मुस्कान से  हर दृष्टा की आँखों में समाकर अपना दानत्व  धर्म निभाता दिखते हैं। सरसों, अपना पीताभोत्सव मनाते हुए धरती को पीतांबर पहनाता है। किसान पिली खिली सरसों को देखकर धरती माँ के प्रति कृत-कृत होकर धन्यवाद ज्ञापित करता है। कमलदल बसंत में प्रचुर मात्रा में खिलकर अपनी पत्तियों से जलराशी को ढककर जलपरत पर अधिकार दर्शाते हैं। जो विभिन्न रंगों में सबको आकर्षित करते हैं।
     बसंत ऋतु में  खिले फूलों पर मंडराते हुए  भौरें और रंगबिरंगी तितलियाँ अपने अत्यल्प जीवन के सर्वोत्तम पल जीने की सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती हुई नजर आतीं हैं। बरसात और ठंड के कारण तितलियाँ और  मधुकर दल का जीवन  बड़ी पीड़ा में व्यथित होता है। बसंत में पुनः ये फूलों पर बैठकर ऐसे पुष्पाधर को चुमते हैं जैसे अखंड तृप्ति का आनंद लेते हो। मधुकर दल आनेवाले दिनों में बसंत के बाद अपनी उपजीविका हेतु मधु अपने छाते में जमा करते हैं; वे इन्सान को यही तो बताना चाहते हैं कि अच्छे समय में भविष्य के लिए संचय की आवश्यकता होती है।
     बसंत महोत्सव में आसमान पूरी तरह से साफ रहता है, शायद वह इन्सान को बताना चाहता है कि देखो मेरी तरह तुम्हारे जीवन में भी अंधकार के बादल छट जाएँगे और खुशियों का अंबर लग जाएगा। रात में शीतल चाँद और चाँदनी के प्रकाश से बसंती रातें सफेद चादर ओढ़े पूरी धरा के जड़ और जीव जगत की दिन की थकान मिटाती है। शीत ऋतु के कारण अपने घोंसलों में बैठे खग जगत बसंत में पेड़-पौधों में गुंजनकर विचरण एवं हर्ष मनाते दिखते हैं। बसंत में  सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पंछी जगत देखते ही बनता है। पंछियों के झुंड के झुंड आसमान में घुमते और चहचहाते  हुए नजर आते हैं।
     बसंत ऋतु सिर्फ प्राकृतिक महोत्सव ही मानव जीवन में हर्षोल्लास और त्योहारों की सौगात भी लेकर आता है। बसंत ऋतु  में ही बसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, होली तथा बैसाखी जैसे प्रमुख पारंपरिक एवं अध्यात्मिक त्यौहार को परंपरागत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
     प्रकृति हमारी गुरु है। बसंत के नवपल्ल्व से हमें जीवन में अपने उत्कर्ष की नवचेतना देता है। खिले फूल जीवन में हमेशा मुस्कुराते रहने की प्रेरणा देते हैं। महकती हुई फूलों की खुशबू हमें जीवन में खिलकर दूसरों के जीवन महकाने की ऊर्जा देती है। वनप्रिया गाकर हमें अपने जीवन में ख़ुशी से गुनगुनाते हुए जीने की उम्मीद देकर जाती है। ऐसे कई संदेश बसंत ऋतु चेतन जगत को देकर जाता है। बसंत ऋतु तो कवियों और लेखकों के अंतस्त बैठे सृजन संवेदनाओं को जागृत कर अपने श्रृंगार का वर्णन कराता है। कवियों के लिए वसंत ऋतु सृजन-लेखन का सर्वोच्च स्त्रोत है। वसंत ऋतु चेतन जगत को जड़ जगत से अनुबंधित रखने का प्रयास अनवरत करते आ रहा है। जो निश्चित ही मानव जगत के लिए प्रेरणास्त्रोत, मंगलमय जीवन द्योतक और हर्षित कार्यप्रेरणा देकर जाता है। बसंत के सौंदर्य का वर्णन करने के लिए मेरी विकसित चेतना असमृद्ध है। बसंत ऋतु के बारे में बस इतना ही कह सकता हूँ-
          बस जाना तू मेरे घट में
          पट तेरा खोल न पा सका
          तू जितना दिखा उतना लिख सका
          करा दे हे मित्र! संपूर्ण दर्शन अपने
          मेरी कलम को शायद तूने ही रोक रखा!
     यह प्यारा बसंत सभी के जीवन में आनंद भरता है और हर्ष भरता रहे। सभी को इस आने वाले पवन बसंत ऋतु पर्व की हार्दिक बधाइयाँ!
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09 जनवरी 2022
लेखक:  मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' ©® 
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका,  सातारा (महाराष्ट्र)

संपर्क पता
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'  
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका
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●हमारी जिम्मेदारी: संस्कारों का बीजारोपण● (आलेख) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'


●हमारी जिम्मेदारी: संस्कारों का बीजारोपण● 

(आलेख)

      हर माता-पिता चाहेंगे कि अपने बच्चे उच्च संस्कारी, उच्च शिक्षित और जीवन में कामयाब बनें। यहाँ सिर्फ चाहा जाता है; पर उसके लिए अपनी जिम्मेदारी निभाने में चूक करते हैं। कुछ तो अभिभावक बताते हैं कि हम उन्हें किसी प्रकार की कमी महसूस ही नहीं होने देते; परंतु समझने की बात है कि सुविधाओं का प्रबंध ही जिम्मेदारी नहीं होती उसकी प्रासंगिकता से बच्चों को अवगत कराना पूरी जिम्मेदारी निभाना है।
       बच्चों को सफलता तक पहुँचाने में माता-पिता की अहम भूमिका है, जो निभाई नहीं जाती। यूँ समझिए कि उन्हें अपनी सही जिम्मेदारी का अहसास ही नहीं है और जिन्हें है वे अभिभावक उँगलियों पर गिनने भर ही है। एक ऐसा भी समुदाय है जो अपनी जिंदगी की भागदौड़ में अपने बच्चों के जिंदगी की गाड़ी को ब्रेक फेल कराते हैं, जो आगे बढ़ने में असमर्थ और दिशाहीन हो जाती है।
       आदरणीय अभिभावको! अपने बच्चों की जिंदगी उजाड़ने के पाप के भागीदार न बनो; नहीं तो ये ही बच्चे बड़े होने पर आपको कोसते और दुत्कारते रहेंगे। यहाँ तक कि हर असफलता के लिए आपको कसूरवार ठहराते रहेंगे। फिर आप कुछ नहीं कर पाएँगे और ढलती उम्र में अपने किए पर पछतावा करने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। अभी वक्त है, वक्त की नजाकत को समझे और बच्चों में अच्छे संस्कारों का बीजारोपण करिए। यह संस्कारबीज बालकों के प्रथम अठारह वर्ष की उम्र तक ही बोए जा सकते हैं, बाद में सिर्फ परिणाम ही देखते रहना है। 
       विनम्रता सभी संस्कारों की नींव है। हमें सबसे पहले यहाँ काम करने की आवश्यकता है। परिवार ही बच्चों की प्रथम पाठशाला होती है, जहाँ बड़ों का अनुकरण करते  हुए सिखा जाता है। बालक विनम्रता का पाठ परिवार के सदस्यों के अनुकरण से सीखता है। अब यहाँ हमें देखना होगा कि बड़ों में कितनी विनम्रता है। हमारी बातचीत और व्यवहार से हमारी विनम्रता व्यक्त होती है। हम एक-दूसरे के साथ आयु के अनुसार आदर और संयम से बातचीत करते रहे। पारिवारिक व्यवहार में सच्चाई, आत्मीयता, स्नेह और स्पष्टता लाने की आवश्यकता है, जिसका अनुकरण करके बच्चे अपने जीवन में अपनाएँगे। बच्चो में विनम्रता लाने से पहले परिवार के हर सदस्य में होनी चाहिए। फिर बच्चों में अपने-आप आ जाएगी। यहाँ चिंतन करने की आवश्यकता है। क्या आप अपने बच्चों को अपनी विनम्रता का अनुकरण-अनुसरण करने का सुअवसर दे रहे हैं? यदि नहीं तो फिर अपने बच्चों से विनम्रता की उम्मीद रखना मूर्खता है। 
       हमारे बच्चे आत्मनिर्भर बनें, ऐसा हरेक पालक चाहता है; लेकिन क्या आपने उसे आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया है! उनका पाठशाला का बस्ता भरना, कपड़े पहनना-उतारना, बिस्तर लगाना-निकालना, अपने भोजन की थाली लेना-धोकर रखना, दूकान से छोटी-छोटी चीजें लाना, उसकी पढ़ाई आदि कई ऐसे छोटे-छोटे काम हैं, जहाँ अभिभावक अत्यधिक प्यार और उत्साह के साथ करते हुए नजर आते हैं। आपका यह उत्साह और प्यार उन्हें आलसी, परावलंबी और कामचोर बना रहा है, यह खुली नज़रों से देखने कि आवश्यकता है। ऐसे में बच्चों के आत्मनिर्भर भविष्य की बात सोचना मीठा पागलपन ही है। मैं यह नहीं कहूँगा कि प्यार मत करो। प्यार ज़रूर कीजिए लेकिन कम से कम आपके प्यार से उसका भविष्य अपाहिज बनने मत दीजिए। वह बिना बैसाकी के अपना सारा काम करें इसके लिए व्यावहारिक प्यार और मार्गदर्शन अवश्य करें। उन्हें आत्मनिर्भर व्यक्तियों की कहानियाँ सुनाइए, पढ़ने दीजिए। यह बीज बचपन में बोने से बढ़ती उम्र में वे स्वयं आत्मनिर्भर बनेंगे। छोटे-छोटे काम स्वयं करने की प्रेरणा प्रदान करें। बच्चों को आत्मनिर्भर बनाएँ।
       सकारात्मकता वर्तमान समय की प्राथमिकता है। बच्चों की बढ़ती उम्र हँसी-ख़ुशी और सफल देखने के लिए हमारे परिवार में सकारात्मक, तनावरहित, खुला एवं उर्जावान वातावरण की बहुत आवश्यक है। इसके बगैर तो अच्छे संस्कार की परिकल्पना भी बेकार है। परिवार के बड़े, बुजुर्ग एवं अनुभवी होने के नाते हमारी प्रथम जिम्मेदारी है कि बच्चों को सकारात्मक, तनावरहित एवं खुला वातावरण प्रदान करें। पारिवारिक समस्याओं का उद्घाटन बच्चों के सामने कभी भी न किया करें। कितनी भी बड़ी पारिवारिक या अन्य समस्या पर परिवार में  सकारात्मक चर्चा हो। सकारात्मकता निडरता और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। परीक्षा फल देखकर कमियों पर चर्चा करने के बजाए बड़प्पन दिखाकर उनका साहस बढाएँ। जो प्राप्त है वह तुम्हारी मेहनत का है, तुम और मेहनत करके और अच्छा कर सकते हो, यह आत्मविश्वास उसमें भरना आवश्यक है। ज़रूरत पड़ने पर उसकी सहायता के लिए तत्पर रहने की भी आवश्यकता है। इससे बच्चों में सकारात्मक सोच निर्माण होगी तथा आगे बढ़ने की उम्मीद जगेगी।
       आज बच्चे यांत्रिक बनते जा रहे हैं। जबतक उनमें प्रेरणा और प्रोत्साहन की पावर मिलती रहेगी तबतक वह कार्य करते रहेंगे। इसमें ढील मिलने पर परिस्थितियाँ जैसे-थी रह जाती हैं। अतः अभिभावकों को यह समझने की आवश्यकता है कि समय निकालकर बच्चों के साथ बातें करें, अध्ययन के बारे में पूछताछ करें, समस्याओं को समझे, उनके मित्र बनकर उनके साथ खेलें और घूमें भी। इनसे उनकी यांत्रिकता समाप्त हो जाएगी। बच्चों की क्षमता को परखे और उनकी क्षमताओं को अभिव्यक्ति देने हेतु मार्गदर्शन करें। अपनी इच्छाएँ और अभिलाषाएँ बच्चों पर न थोपी जाए। उन्हें उनकी क्षमा के अनुसार उभरने दीजिए; वरना आप की ऊँची आकांक्षाओं को पूरा करते-करते उनका जीवन बौना बन जाएगा। 
       आइए इस नववर्ष के हर्ष में अपने बच्चों के सर्वोत्तम अभिभावक बनकर परिवार में नया हर्ष भरने का प्रयास करें। अभिभावक होने के नाते इन बातों पर चिंतन अवश्य करें। प्रण करें कि हम अपने बच्चों के वो आतंरिक शिल्पकार बनेंगे जो बच्चों के भविष्य की सुंदरता को आकर दिला सकेंगे। आज नहीं तो फिर कभी नहीं। नववर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएँ!
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29 दिसंबर 2021
लेखक:  मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' ©® 
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका,  सातारा (महाराष्ट्र)

संपर्क पता
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'  
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका
भिरडाचीवाडी, डाक- भुईंज,  
तहसील- वाई, जिला- सातारा महाराष्ट्र
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मोबाइल: 9730491952
ईमेल: machhindra.3585@gmail.com
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नल की टोटी पर (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'


नल की टोटी पर

(कविता)

नल की टोटी पर 
चिड़िया ने दी गुहार
दो बूँद पानी की...
कि प्यास बुझा लूँ
तो पंख पसारूँ
सैर करूँ जहान की।
खुल गई टोटी
और खुल गई चोंच,
बार-बार उड़ी फिर मुड़ी
देखती रही खरोंच...
पर कहाँ मिलीं उसे
दो बूँद पानी की
पानी ने क्या ठाना था
लेनी जान नन्हीं की...
सब्र का बाँध अब टूट रहा
जी से नाता छूट रहा
साँसें भी अब फूल रही
आँखें भी अब मूँद रहीं
पानी, पानी की हर पुकार
हो गई थी अब बेकार...
पता चला के भूल हुई
गाँव छोड़ शहर चली
चकाचौंध के दिन थे चार
फिर घुमती रही लाचार
अब पछताए होत क्या
शहर जो चुग गया खेत
गाँव जबसे शहरी बना
कौन है यहाँ किसके हेत....
अब दाना है न पानी है
समाप्ति की बस कहानी है
पानी, पानी और पानी 
साँस फूली जो नन्हीं की
नर का नरक अब छूट गया
राह पकड़ ली सरग संसार की।
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दिनांक: 25 दिसंबर 2021
रचनाकार:  मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' ©® संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका,  सातारा (महाराष्ट्र)

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संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका
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■ कोंकण की सैर■ (बाल कहानी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

कोंकण की सैर (कहानी रविवार की सुबह थी। आसमान में हल्के बादल छाए हुए थे। घर के आँगन में आम के पेड़ के नीचे दादा जी आराम से बैठे अखबार पढ़ रहे...

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