मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

●एक प्यारी तितली● (बाल गीत) - मच्छिंद्र भिसे



●एक प्यारी तितली●
(बाल गीत)
एक प्यारी तितली उड़ी चली
खुशियाँ बहार देती चली
न जाने कहाँ उड़ी चली
इस कली या उस गली
एक प्यारी तितली उड़ी चली।

बगियन में हैं फूल हजार
इंद्रधनुष्य-सी बिछी बहार
सखियों संग करें बातें चार
भँवरों की भी लगी है कतार
न जाने क्या वहाँ फँसी चली
एक प्यारी तितली उड़ी चली।

तितली हमारी है नादान
भँवरे भी करते परेशान
सुंदरता की वह है खान
काँटों में ना अटके जान
लौट आ जाए अपनी गली
एक प्यारी तितली उड़ी चली।

बिन तितली के आँगन सूना
ना कोई अनहोनी हो ना,
तितली के बिन आए न चैना
बाँट जोहते मेरे नयना
न जाने कहाँ  रुकी भली
एक प्यारी तितली उड़ी चली।
-०-
15 दिसंबर 2019
● मच्छिंद्र भिसे ©®
(अध्यापक-कवि-संपादक)
-------////// --------------
सातारा (महाराष्ट्र) पिन- 415 515
मोबाइल: 9730491952
ईमेल: machhindra.3585@gmail.com

●उपरोक्त रचना मौलिक, अप्रकाशित है●

*अधूरेपन का अहसास*


*अधूरेपन का अहसास*
(विधा: मुक्तक कविता)

एक दिन बेजान झोंपड़ी में
बूढ़े माँ-बाप को बेसहारा देखा,
लगा पल के लिए
कलियुग ने भी सतयुग भूलकर
खींच दी अधूरेपन की अनमीट रेखा।

जिस अयोध्या-सी मिट्टी में खेला
डाली-पेड़, बालसखा संग
किया करता था रामलीला,
ढल गया वक्त छूटे साथी,
भूल गया सबकुछ पीछे छोड़ा न बाकी  
अपने अस्तित्व की खोज में
चल पड़े राम ने कभी मुड़कर न देखा
और खींचता रहा, अधूरेपन की अनमीट रेखा।

क्या हुआ था हाल दशरथ का
आज का राम भूल गया,
अपने स्वार्थ के लिए वह भी
शहरी वनवास को चला गया,
रंग देखे शहरी, शहर में ही रहा रुका,
छोड़ अपने दशरथ, कौशल्या, भरत को
खींच दी अधूरेपन की अनमीट रेखा।

झोंपड़ी में दशरथ अपने राम की
सूखे होठों से रट लगाए बार-बार,
लौटेगा राम हमारा, सब करते रहे इंतज़ार,
बस! एक झलक दिखा देना राम
इसी चाहत में धरा पर रुका है अवसान
जब भी ऐसा खत पाता, राम करता अनदेखा
और बनाता रहा गर्द अधूरेपन की रेखा।

राम की बेरुखी पर वक्त भी सहम गया
लौट आने अयोध्या, राम को बाध्य किया,
देख सूना आँगन और सूखे पेड़ को
पिता को मिलने दौड़ा चला गया
पछतावा भी था परवान चढ़ा
शहरी छत टूट गए, चाहता अपनों का साया।  
स्वार्थी आहट पाकर यमराज भी न रुका
नजरें भिड़ीं जब एक-दुजे की, तब
हमेशा के लिए खींच गई अधूरेपन की रेखा।    
-०-
१० जुलाई २०२०
“चाहे कितनी ही ऊँचाई को हम क्यों न छू ले, बुनियाद और रिश्तों की अहमियत बनी रहे।” 
***
रचनाकार
*मच्छिंद्र भिसे*©®
अध्यापक-कवि-संपादक
सातारा (महाराष्ट्र)
मो. 9730491952
🌹💐🙏🌹💐🙏

सोलह आना (हाइकु) - मच्छिंद्र भिसे

*सोलह आना*
(विधा: हाइकु)
***
सच था झूठा
दिखता कुछ और
मिली न ठौर।
***
कौन किसका
वक्त ही बता देता
आपसी रिश्ता।
***
कभी किसी का
बना था मैं भी कभी
भूलें है सभी।
***
इंची मुस्कान
फरेब न जाने तो
लेती है जान।
***
आप-हमारे
काम निकलें जब
न ही विचारे।
***
जब हैं देते
निचोड़ लेते सभी
भूलेंगे सभी।
***
अपने हाथ
जीवनभर चलें
अपने साथ।
***
रिश्ते हैं खाली
दूजे घर दिवाली
अपनी होली।
***
देते रहेंगे
जब तक औरों को
मित कहेंगे।
***
खाली हो मुट्ठी
कोई पास न आए
न मित्र कहे।
***
खाली की जेब
जिनके वास्ते कभी
स्वार्थी थे सभी।
***
जीवन सूना
लगेगा हर पल
कर्म के बिना।
***
देर से सही
सही राह पकड़ो
मन ने कही।
***
भूल हो गई
क्यों अच्छा बना मैं जो
तौहीन हुई।
***
खाए हैं धोखे
प्यार में नहीं साब
रिश्तों के लिखें।
***
दहला मन
पीड़ा से एक दिन
होगा पावन।
***
मीठी वाणी ने
तीखा जहर दिया
हमने खाया।
***
अब जहर
फैल गया तन में
और मन में।
***
वक्त बेवक्त
हिसाब लेगा सबका
न बनो सख्त।
***
प्रश्न है यही
कौन किसको थामें
टूटे हिया में।
***
की मेहनत
रंग दिखेंगे कभी
सोच लो अभी।
***
नेकी की सोच
अंतर्मन हो साफ
पूजेंगे आप।
***
घट के वासी
खुद को पहचानो
सीना न तानो।
***
भुजा में शक्ति
भर लो हरदम
ना मिलें गम।
***
अपने आप
कभी गर्व ना करें
जिए या मरें।
***
मिट्टी का तन
मिट्टी में ही मिलेगा
किसी भी क्षण ।
***
कर्म करेंगे
कर्मरत रहेंगे
नहीं रुकेंगे।
***
सोलह आना
बात कहूँ मैं सच
झूठों से बच।
-0-
10 मई 2020
● मच्छिंद्र भिसे ● ©®
(अध्यापक-कवि-संपादक)
सातारा (महाराष्ट्र) पिन- 415 515
मोबाइल: 9730491952 / 9545840063
ईमेल: machhindra.3585@gmail.com
-०-

■ कोंकण की सैर■ (बाल कहानी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

कोंकण की सैर (कहानी रविवार की सुबह थी। आसमान में हल्के बादल छाए हुए थे। घर के आँगन में आम के पेड़ के नीचे दादा जी आराम से बैठे अखबार पढ़ रहे...

आपकी भेट संख्या