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■ पंढरपुर की वारी — महाराष्ट्र की एकता का प्रतीक ■ (एकांकी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

पंढरपुर की वारी — महाराष्ट्र की एकता का प्रतीक


पात्र:

  • शिक्षक
  • आरव
  • स्नेहा
  • रोहन

स्थान: विद्यालय का कक्षा-कक्ष
समय: प्रार्थना सभा के बाद
दृश्य: कक्षा में शिक्षक के आसपास विद्यार्थी बैठे हैं। बाहर से हल्के भजन और ताल-मृदंग की आवाज सुनाई देती है।


दृश्य आरंभ

(मंच पर शिक्षक बैठे हैं। आरव, स्नेहा और रोहन आपस में बातचीत कर रहे हैं। बाहर से “ज्ञानोबा-तुकाराम” का जयघोष सुनाई देता है।)

आरव: (आश्चर्य से) अरे! यह कैसी आवाज आ रही है? कोई भजन-कीर्तन हो रहा है क्या?

स्नेहा: हाँ, मुझे भी सुनाई दे रहा है। लगता है, वारी के लोग जा रहे हैं।

रोहन: वारी? वह क्या होती है? मैंने इसका नाम तो सुना है, लेकिन ठीक से पता नहीं।

शिक्षक: (मुस्कुराते हुए) बहुत अच्छा प्रश्न, रोहन! आज हम इसी विषय पर बात करेंगे। बताओ, पंढरपुर की वारी के बारे में तुम लोगों ने क्या सुना है?

आरव: सर, मैंने सुना है कि लोग पैदल चलकर पंढरपुर जाते हैं और भगवान विठ्ठल के दर्शन करते हैं।

शिक्षक: बिल्कुल सही। पंढरपुर की वारी महाराष्ट्र की एक प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है। इसमें अलग-अलग गाँवों और शहरों से हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं।

स्नेहा: सर, ये लोग इतनी लंबी यात्रा पैदल क्यों करते हैं?

शिक्षक: यह उनकी भगवान विठ्ठल के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। यात्री भजन, कीर्तन और अभंग गाते हुए आगे बढ़ते हैं। इस यात्रा में संत ज्ञानेश्वर महाराज और संत तुकाराम महाराज की पालखियों का विशेष महत्व है।

रोहन: पालखी में क्या होता है?

शिक्षक: पालखी में संतों की पादुकाएँ रखी जाती हैं। भक्त पालखी के साथ अनुशासनपूर्वक चलते हैं और “ज्ञानोबा-तुकाराम” का जयघोष करते हैं।

(तीनों विद्यार्थी उत्सुकता से शिक्षक की ओर देखते हैं।)

आरव: सर, वारी में तो अलग-अलग जगहों के लोग आते होंगे। फिर वे सब एक साथ कैसे रहते हैं?

शिक्षक: यही तो वारी की सबसे बड़ी विशेषता है! इसमें किसान, मजदूर, व्यापारी और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग एक साथ चलते हैं। वे एक-दूसरे की सहायता करते हैं और मिल-जुलकर यात्रा पूरी करते हैं।

स्नेहा: यानी वहाँ किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता?

शिक्षक: वारी का संदेश ही समानता और भाईचारे का है। कोई किसी को पानी पिलाता है, कोई भोजन देता है और कोई थके हुए यात्री की सहायता करता है। इस तरह सेवा और सहयोग की भावना दिखाई देती है।

रोहन: अब समझ में आया कि वारी को महाराष्ट्र की एकता का प्रतीक क्यों कहा जाता है।

शिक्षक: बिल्कुल! वारी हमें सिखाती है कि सबको साथ लेकर चलना चाहिए। हम अलग-अलग स्थानों से आए हों, हमारी भाषा या परिस्थितियाँ अलग हों, फिर भी हम एक-दूसरे के साथ मिलकर रह सकते हैं।

आरव: सर, क्या हम विद्यार्थी भी वारी से कुछ सीख सकते हैं?

शिक्षक: अवश्य! हमें अपने मित्रों की सहायता करनी चाहिए, सभी का सम्मान करना चाहिए, भेदभाव नहीं करना चाहिए और विद्यालय को स्वच्छ रखना चाहिए।

स्नेहा: यानी वारी हमें केवल भक्ति ही नहीं, बल्कि अच्छे इंसान बनने की सीख भी देती है।

शिक्षक: बिल्कुल सही। वारी हमें प्रेम, समानता, सेवा, सहयोग, अनुशासन और मानवता का संदेश देती है।

रोहन: सर, अगर वारी का संदेश एक वाक्य में कहना हो तो?

शिक्षक: (भावपूर्ण स्वर में)
“मिल-जुलकर चलो, एक-दूसरे का साथ दो और सभी का सम्मान करो।”

(कुछ क्षण का मौन। बाहर से फिर 'ज्ञानोबा-तुकाराम' का जयघोष सुनाई देता है।)

आरव: सर, अब जब भी मैं वारी का नाम सुनूँगा, मुझे केवल पंढरपुर की यात्रा नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की एकता याद आएगी।

स्नेहा: और मुझे सेवा तथा सहयोग की भावना याद आएगी।

रोहन: मुझे याद रहेगा—सबको साथ लेकर चलना है।

शिक्षक: शाबाश बच्चों! यही पंढरपुर की वारी का सच्चा संदेश है।

(सभी विद्यार्थी एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे आते हैं।)

सभी:

'ज्ञानोबा-तुकाराम!'

'एकता और मानवता की जय!'

(पृष्ठभूमि में हल्का भजन बजता है। सभी पात्र मंच से बाहर जाते हैं।)

— एकांकी समाप्त —

25 जुलाई 2026 शाम: 04.00 बजे
लेखक : मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'
अध्यापक-लेखक-संपादक
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ: गोंदिया (महाराष्ट्र)
मो. ९७३०४९१९५२
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● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
सेवार्थ निवास : शिक्षण सेवक, जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
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