मच्छिंद्र बापू भिसे 9730491952 / 9545840063

'छात्र मेरे ईश्वर, ज्ञान मेरी पुष्पमाला, अर्पण हो छात्र के अंतरमन में, यही हो जीवन का खेल निराला'- मच्छिंद्र बापू भिसे,भिरडाचीवाडी, पो. भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा ४१५५१५ : 9730491952 : 9545840063 - "आपका सहृदय स्वागत हैं।"

■ हौसले फौलादी ■ (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

 

■ हौसले फौलादी 

(कविता)

जीत जाए तन के विकार
हर जाए मन संकोच विचार,
हो हर पथ‌ हौसले फौलादी
रिपु जो करे सौ-सौ प्रहार!

अनंत अभिलाषाएँ लेकर चलें
तूफानी धूल चाहे दो हाथ मिलें
चाहे राह पर हार-पुष्प खिलें,
करते रहे नेक शर बौछार!

अनंत भुवन तुम्हारा होगा
जब जितने का जज्बा होगा
तू और तू ही को चलना होगा,
न लगा किसी से आस-गुहार!

चाहे पद डग मग हो जाए
चाहे हाथ अनंग हो जाए
चाहे आँख दीपदान हो जाए,
अस्ति साँसें भी लाए लौ बहार!

तम के बिन क्या उजियाला 
गम के बिन सुख भी अकेला
लगेगा तुम बिन संसार का मेला,
बस तू जी ले चैन के दिन चहार!
-०-
07 अक्बतूर 2022
रचनाकार:  मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' ©® 
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका,  सातारा (महाराष्ट्र)


संपर्क पता
● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'  
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका
भिरडाचीवाडी, डाक- भुईंज,  
तहसील- वाई, जिला- सातारा महाराष्ट्र
पिन- 415 515
मोबाइल: 9730491952
ईमेल: machhindra.3585@gmail.com
-0-



■ गुरुदेवा तेरी ■ (प्रार्थना गीत) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

■ गुरुदेवा तेरी 

(प्रार्थना गीत)

गुरुदेवा तेरी छवि ना भूूलें
अज्ञान तम - सा मेरा जीवन
संज्ञान के आत्म दीप है जलें।
गुरुदेवा तेरी....

आप हैं तो जगत है सारा
आप बिन पाए कौन सहारा;
भटके थे हम राहें अपनी
आप नेक राह को लाए।
गुरुदेवा तेरी....

कर्मनिष्ठा की लौ जलाई
श्रमिकता की रीत बताई;
इसी डगर से गुजरे हम भी
निज मंजिल को पा लें।
गुरूदेवा तेरी....

राहें अँधियारी जब-जब पाई
अज्ञानी मन पर बदरी छायी;
आप के बस ज्ञान स्मरण से
हर घन फूल-सा खिलें।
गुरूदेवा तेरी....
-०-
05 सितंबर 2022
रचनाकार:  मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' ©® 
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका,  सातारा (महाराष्ट्र)


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भिरडाचीवाडी, डाक- भुईंज,  
तहसील- वाई, जिला- सातारा महाराष्ट्र
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■ दीप जले थे ■ (कविता) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'


 ■ दीप जले थे 

(कविता)

कभी सोचा न था मैंने
एक दिन ऐसा भी आएगा,
आहत होगी माटी मेरी
नदियों में लहू बह जाएगा।

वे मनहूस दिन
लहू की खेल रहे थे होली
रणबाँकुरे भारत माँ के
सीने पर झेल रहे थे गोली
देखे मैंने छलनी होते कितने ही तन
बिखर पड़े थे न जाने कितने ही बदन।

पर सच कहूँ ...
हर सूरमा जी-जान से लड़ा था
दुश्मन भी देख इनका रूद्रतांडव
अंतस्थ लड़खड़ा था
बुलंद हौसले और शहीदी पर उनके
उन दिनों हिंदुस्थानी दिल सिहर उठा था।

ले शपथ मातृभूमि और शहीदों की  
सौ जाने लुटाने हर सूरमा निकले थे
वे भी क्या खूब लढ़े
नजरें मिला दुश्मनों से जा भिड़े थे
दो माह के इस युद्ध में
हिंदुस्थानी वीर जीत का तिरंगा गाड़े थे।

जीत की ख़ुशी में आहत सारा हिन्दुस्थान
२६ जुलाई ’९९ को दिवाली मना रहा था
बहता घाटी का खून
तेल बनकर जगमगा रहा था
परिजन-स्नेहियों की आँखों से
पवित्र धारा बन बह रहा था।

दिन बितते गए खून के धब्बे धुल गए
पर मेरे मन के दाग और गर्द हो गए
कैसे भूल सकती हूँ मैं सूरमाओं को
जो रक्षा में उन दिनों गोद मेरी सो गए
आज जब घाटी में सैनिक को देखती हूँ
उन सूरमाओं की छवि को निहारती हूँ।

पर मन दहल उठता है
किसी और शहीदी को सूना करती हूँ  
मैं हूँ कारगिल की घाटी
सूरमाओं को शत-शत वंदन करती हूँ।
-०-
26 जुलाई 2020
रचनाकार:  मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत' ©® 
संपादक : सृजन महोत्सव पत्रिका,  सातारा (महाराष्ट्र)

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■ कोंकण की सैर■ (बाल कहानी) - मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'

कोंकण की सैर (कहानी रविवार की सुबह थी। आसमान में हल्के बादल छाए हुए थे। घर के आँगन में आम के पेड़ के नीचे दादा जी आराम से बैठे अखबार पढ़ रहे...

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