
'कंकड़ी मोती'
विधा: हाइकु
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12 अगस्त 2020
मच्छिंद्र भिसे ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
9730491952
-0-

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कंकड़ी नींव
जगत खड़ा होय
क्यों रहा रोय।
(छोटी शुरुआत)
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कंकड़ी कहे
छोटा काज नहीं
आँखन गई।
(दिखता वैसा)
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पर्वत बड़ा
कंकड़ जोड़ जोड़ी
हुआ जो खड़ा।
(छोटा समूह)
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मोल क्या बड़ा
कंकड़ सब हम
मिटे क्या तम?
(अंधकार ही बड़ा)
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कंकड़ी प्रीत
जग अपना लेत
गाओ रे गीत।
(थोड़ा-सा प्यार)
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राहत कैसे?
कंकड़ ही कंकड़
राह में फँसे।
(छोटी बाधाएँ)
------------🙏---------
फूल पाएँगे
कंकड़ पर चले
काँटे खिलेंगे।
(बाधा पार करें)
------------🙏---------
मन कंकड़
हाथ न कुछ आए
मिट भी जाए।
(बड़प्पन के भाव)
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कंकड़ी मोती
परीधि में ही गाता
आकार देता।
(कर्मवादीता)
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जगत खड़ा होय
क्यों रहा रोय।
(छोटी शुरुआत)
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कंकड़ी कहे
छोटा काज नहीं
आँखन गई।
(दिखता वैसा)
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पर्वत बड़ा
कंकड़ जोड़ जोड़ी
हुआ जो खड़ा।
(छोटा समूह)
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मोल क्या बड़ा
कंकड़ सब हम
मिटे क्या तम?
(अंधकार ही बड़ा)
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कंकड़ी प्रीत
जग अपना लेत
गाओ रे गीत।
(थोड़ा-सा प्यार)
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राहत कैसे?
कंकड़ ही कंकड़
राह में फँसे।
(छोटी बाधाएँ)
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फूल पाएँगे
कंकड़ पर चले
काँटे खिलेंगे।
(बाधा पार करें)
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मन कंकड़
हाथ न कुछ आए
मिट भी जाए।
(बड़प्पन के भाव)
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कंकड़ी मोती
परीधि में ही गाता
आकार देता।
(कर्मवादीता)
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मच्छिंद्र भिसे ©®
सातारा (महाराष्ट्र)
9730491952
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